भोजराज पोखरेल, पूर्वप्रमुख निर्वाचन आयुक्त
काठमाण्डू, १४ फागुन (रासस): लोकतन्त्रमे निर्वाचन प्रणाली केबल प्रतिनिधि छनौट करबाक प्राविधिक प्रक्रिया मात्रे नै राज्यके वैधता, समावेशिता आ जनविश्वासक आधारस्तम्भ सेहो अइछ ।
निर्वाचन प्रणालीकेँ समयानुकूल सुधार नै कएल गेल तँ लोकतन्त्रक संस्थागत मजबुती कमजोर भ सकैत छै । नेपालक निर्वाचन प्रणालीकेँ आओर समावेशी, पारदर्शी आ विश्वसनीय बनेलाक बाद लोकतन्त्रकेँ संरचनात्मक रुपमे मात्रे नै व्यावहारिक रूपमे सेहो जनमुखी बनाएल जा सकैय । नेपालक निर्वाचन प्रणालीकेँ समावेशी, पारदर्शी आ उत्तरदायी बनेबाक लेल बहस करबाक समय भेल छै ।
नेपाल लम्बा समयधैर बहुमतीय निर्वाचन प्रणालीकेँ अवलम्बन करैत आएल छलै । २०६२/६३ सालक जनआन्दोलनक बाद द्वन्द्व व्यवस्थापन करबाक क्रममे अन्तरिम संविधान बनाबैत समय मिश्रित निर्वाचन प्रणालीकेँ अपनाएल गेल छल। ई बहुमत आ समानुपातिक प्रणालीके सम्झौतासँ आएल प्रणाली छै । द्वन्द्वके विभिन्न कारक तत्वसभमध्ये नीति निर्माण तहमे सबके आवाज नै पहुँचल छै । नीति निर्माण तहमे कोनो खास वर्ग, समूह या लिङ्गके बोलबाला रहल मुदा, महिला, आदिवासी, जनजाति, दलित, मधेशीके प्रतिनिधित्व नै भ सकल शिकायक आधारमे अन्तरिम संविधानमे मिश्रित प्रणालीके व्यवस्था कएल गेल छलै । विविध जातीय, भाषिक, भौगोलिक आ लैङ्गिक संरचना भेल देशमे प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली सब समुदायक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नै कएल गेल परिवेशमे समानुपातिकदिस जनसङ्ख्याके आधारमे समानुपतिक प्रतिनिधित्व करेबाक लेल कोटाके व्यवस्था कएल गेल छल ।
मिश्रित निर्वाचन प्रणालीसँ हमरासभ संसद्केँ समावेशी बनेबाक प्रयास केलौँ । संविधान सभामे भेल प्रतिनिधित्व समावेशी चरित्रक नेपालके संविधान निर्माण केलक । समानुपातिक प्रणालीमार्फत महिलासँ ल क दलित, आदिवासी जनजाति, मधेशी आ पिछड़ल वर्गके संसद्मे उपस्थिति बढ़ल छै । ई सकारात्मक पक्ष छै । मुदा, व्यवहारमे संसद्मे दू प्रकारक प्रत्यक्ष आ समानुपातिक सांसद छै । समानुपातिकसँ आएल किछ सांसद्सभक क्षमतामे प्रश्न उठल । समानुपातिक सूची तैयार करैत समय दलसभमे पारदर्शिता आ आन्तरिक लोकतन्त्रके अभावसँ समावेशिताकेँ केवल औपचारिकतामे सीमित करबाक खतरा देखल गेल । संसद्मे कोनो दल बहुमत हासिल करबाक अवस्था नै रहि गेल । जइ कारण प्रणालीपर बहस होबए लागल । मिश्रित निर्वाचन प्रणाली बहुमत नै दैत छै से सबके जानकारी नै हएत । ई प्रणाली ओहन समयमे काज करैत छै, जहन राजनीतिक दलसभमे सहमतीय संस्कारके विकास होइत छै । अपनासभक दलसभ अखनो संस्थागत नै भ सकल छै । चुनावक सिद्धान्तके अर्थ बहुमत हासिल करएबला पाँच वर्ष शासन करबाक आ बहुमत हासिल नै करएबला प्रतिपक्षमे रहिक सरकारकेँ खबरदारी करत । मुदा, अपनासभक दलसभमे ओइ प्रकारक धैर्यता नै भेलासँ राजनीतिक प्रणाली आ दलसभ बीचक चरित्रमे बहुत अन्तर छै । जइके परिणामस्वरुप सत्ता आ शक्ति केन्द्रित निरन्तर होएबला गठबन्धनसँ आम नागरिकमे व्यवस्थाप्रति अविश्वास बढ़ौने छै ।
संसारमे कोनो निर्वाचन प्रणाली नीक या नै नीकसँ बेसी ओकरा चलाबैबला व्यक्तिके क्षमतामे मूल्याङ्कन कएल जाइत छै । नीक शासन व्यवस्था भेल, भ्रष्टाचार कम भेल, सुशासन भेल आ जनता खुसी भेल देशसभक सूचीकेँ अध्ययन कएलापर ओहन बहुमत देशसभ पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली अपनौने छै । बहुमतीय प्रणालीमे कोनो दलके बहुमत हासिल नै भेलाक बादो राजनीतिक दलसभ बीच मिल क संयुक्त सरकार चलौने पड़ोसी देश भारतसँ सिख सकैत छी । समावेशिताके सवालमे नेपालक निर्वाचन प्रणाली ऐतिहासिक उपलब्धी हासिल कएलाक बादो एकर गुणात्मक पक्ष अखनो कमजोर रहल लोकसभक शिकायत छै । संसद्मे सङ्ख्या बढ़लासँ मात्रे नै हएत; नीति निर्माणमे प्रभावकारी सहभागिता सुनिश्चित होबाक चाही । हमरासभ जतेक निर्वाचन प्रणाली अभ्यासमे आनलौँ, विगतमे जतेक बेर बहुमतक सरकार बनलाक बादो ओ दलसभमे आन्तरिक व्यवस्थापन नै भेलासँ अल्पायुमे सरकारसभ भंग भ गेल ।
यद्यपि अपनासभक निर्वाचन प्रणालीमे किछ सुधार करबाक आवश्यक छै । बितल किछ सालसँ निर्वाचन बेसी महँग भेल छै । गलत तरिकासँ कमौने धनबला व्यक्ति आगु आएल छै । इमान्दार व्यक्ति निर्वाचनमे प्रतिस्पर्धा करबाक अवस्था नै छै, तँ असमान बीच प्रतिस्पर्धा होबाक क्रम बढ़ल छै । शासनक अभ्यास करैत समय गलत परिपाटीके विकास कएल गेल छै । दल आ सरकार बीच भिन्नता नै छै । राज्य संयन्त्रकेँ दलक स्थानीयसँ केन्द्रधैरके समानान्तर संस्थासभ दलके बन्धक बनेबाक अवस्था छै । निर्वाचित निकाय स्वतन्त्रतापूर्वक काज नै क सकबाक अवस्था उत्पन्न भेल छै । जइके कारण नेता–कार्यकर्ताकेँ शक्तिमे जेबाक महत्वाकांक्षा बढ़ल छै ।
राजनीतिमे परिपक्वता एनाइ जरुरी छै । दलसभमे सहिष्णुता, आन्तरिक लोकतन्त्रके अभ्यास, उत्तरदायी आ जिमेवारी होबाक चाही । जहन लोकतन्त्र परिपक्व हएत, दलसभक प्रस्तुतिमे सेहो परिमार्जन हएत । पश्चिमी देशसभमे कोनो खास अवस्थामे मात्रे दलसभ मैदानमे आबैत छै, अन्य समयमे निष्क्रिय रहैत छै । शासन सत्तामे अतिक्रमण नै करैत छै । इएह कारण दलसभ जनताके बीचमे बदनाम नै होइत छै । अपनासभक देशमे सेहो अइ प्रकारक राजनीतिक सुधारक आवश्यकता छै ।
आब की करब ?
निर्वाचनसँ आबैबला संसद्केँ समावेशी, जनउत्तरदायी आ जिमेवारपूर्ण बनेबाक लेल हालके निर्वाचन प्रणालीमे किछ सुधारक विकल्पसभ भ सकैत छै । अपनासभ पहिलेजका बहुमतीय (प्रत्यक्ष निर्वाचन) प्रणालीमे जा सकैती छी । मुदा, अइमे प्रतिनिधित्व नै होएबलाक लेल उम्मेदवारीमे मिलाएल जा सकैय । उम्मेदवारी जनसङ्ख्याके प्रतिशतक आधारमे कएल जा सकैय । अइ लेल विभिन्न अभ्याससभ छै । दोसर विकल्प, पूर्ण समानुपातिक भ सकैय । अइसँ निर्वाचन खर्च कम होबाक तथा अशान्ति नै हएत । विगतके समानुपातिक प्रणालीके कमजोरीकेँ कानुनसँ नियन्त्रण कएल जा सकैय । अत्यधिक खर्चसँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धाकेँ असमान बनेबाक, धनके प्रभाव बढेबाक आ योग्य मुदा, आर्थिक रूपमे कमजोर उम्मेदवारसभकेँ प्रतिस्पर्धासँ बाहर राखत । अइसँ दीर्घकालमे राजनीतिक नेतृत्वक चरित्र परिवर्तन क सकैय ।
तेसर विकल्प, अखनजका मिश्रित निर्वाचन प्रणालीमे गेलासँ प्रत्यक्ष दिसके उम्मेदवारीमे भेल अन्यायके अन्त करए पड़त । अखन समानुपातिक दिसक सिटकेँ सब जनसङ्ख्याकेँ कोटामे वितरण केलौँ मुद, ओइ कोटामे आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक रूपमे पाछु भेल वर्गकेँ न्याय नै सकलौँ । अंशवण्डासँ नै जे प्रत्यक्ष्यसँ नै आइब सकत, विविध कारणसँ कमजोर छै ओइ लिङ्ग, समूह आ वर्गकेँ मौका देबाक चाही आ ओइ लेल मात्रे कोटा होबाक चाही । तहिना, समग्र देशकेँ एकटा निर्वाचन क्षेत्र माइन क समानुपातिक सूची तैयार करैत समय दलक नेतृत्व अपना अनुकूल होएजका क्षेत्रीय सन्तुलन नै मिलएजका उम्मेदवार छनौट करए लागल छै । एना कएलासँ कोनो क्षेत्र, वर्ग या समुदायसँ केकरो प्रतिनिधित्व नै होबाक, केकरो बेसी होबाक अवस्था छै । आब ओइके सट्टा प्रदेशस्तरीय सूची बनाओल जा सकैय । एना कएलासँ हरेक प्रदेशक विशेषता, ओइ ठामक भूगोल, जनसङ्ख्या, संस्कृतिके प्रतिनिधित्व भ सकैय । अइमे ८० प्रतिशत प्रादेशिक आ २० प्रतिशत राष्ट्रिय दृष्टिसँ सूची बनाओल जा सकैय । ओइ २० प्रतिशतमे राज्यद्वारा सम्मान करबाक, संसदमे अति आवश्यक भेल विशिष्ट व्यक्तिसभकेँ समेटल जा सकैय ।
समानुपातिकदिस अखनके थ्रेसहोल्ड तीन प्रतिशतके प्रावधानक कारण सरकार बनेबाक लेल समस्या भेल कहल जाइत छै । लक्षित वर्गकेँ समेटएजका कोटा छुटियाबैत समय अखनसँ आधा बेसी समानुपातिक सिट आवश्यक नै हएत । अइ तरिकासँ बचत होएबला सिटसँ प्रत्यक्षदिसक सिट बढ़ाओल जा सकैय । एना कएलासँ एकटा दल बहुमत हासिल करबाक सम्भावना हएत ।
आसन्न निर्वाचनक महत्त्व
एखनुक निर्वाचन असामान्य परिस्थितिके कारण उत्पन्न भेल असामान्य निर्वाचन छै । ई अवस्था उत्पन्न होबाकमे बहुतो तत्त्वसभ जिमेवार छै । शासन प्रणालीमे उत्तरदायित्व, जवाफदेहिता, सेवा प्रवाह, भ्रष्टाचार, पुस्तान्तरणक प्रश्नसभसँ जेनजी आन्दोलनक प्रस्फुटन केलक । अइ प्रश्नसभक सम्बोधन करब आबके संसदके सबसँ पैघ जिमेवारी रहत । अइ मुद्दासभकेँ अपनत्वसहित निकास देबाक लेल हमरासभक कानुन, नीति, प्रणालीमे सुधार करए पड़त, संरचनासभकेँ मजबुत बनाबए पड़त आ सुशासनक राजमार्गमे देशकेँ आगु करए पड़त । आइ नेपालक लोकतन्त्रके भविष्य निर्वाचन प्रणालीके विश्वसनीयतासँ प्रत्यक्ष रूपमे जुटल छै । जनता अपन मतके मूल्य सुरक्षित रहल अनुभूति नै कएलाधैर लोकतन्त्रके आधार कमजोर रहत । निर्वाचन प्रणाली स्थिर संरचना नै ई समाजक परिवर्तन सङे परिमार्जित करबाक जीवित प्रणाली छै । समावेशिता, पारदर्शिता, खर्च नियन्त्रण, प्रविधिके विश्वसनीय प्रयोग आ राजनीतिक संस्कृतिमे सुधार–ई सब पक्षकेँ सन्तुलित रूपमे आगु बढ़ौलाक बाद मात्रे नेपालक लोकतन्त्र सुदृढ़ हएत ।
अगिला फागुन २१ गते होबए लागल निर्वाचनकेँ सफल बनौनाइ हमरासभक दायित्व छै । निर्वाचन नै भेलासँ उत्पन्न होएबला परिणाम अपनासभक सोचसँ बेसी खतरनाक हएत । ओहन अवस्था केकरो लेल फलदायी नै हएत । निर्वाचन करेबाक जिमेवारी निर्वाचन आयोगक भेलाक बादो अपना सबके भूमिका समान छै । अइ निर्वाचन प्रणालीके अभ्याससँ केकरा बहुमत हासिल हएत या नै हएत से नै कहल जा सकैय । कोनो दलके बहुमत हासिल नै भेलाक बादो संयुक्त सरकार बनाबए पड़त । ओइ समयमे फेरसँ अपवित्र किसिमके गठबन्धन क जनताकेँ निराश नै करबाक चाही । नयाँ संसद बनलाक बाद सबके सहमतिसँ एकटा सङ्कल्प प्रस्ताव पारित करैत देशकेँ मार्गनिर्देशन करएबला आ जनताकेँ थप निराशासँ रोइक सकए से शुभकामना ।
(प्रस्तुत विचार पूर्वप्रमुख निर्वाचन आयुक्त पोखरेलसँ राससके आलेख प्रमुख कृष्ण अधिकारीद्वारा कएल गेल बातचितमे आधारित)





