अशोक दत्त

अशोक दत्त
अखन बाँकी अछि
किछ युवा भरमा रहल
किछ वयस्काे ओझरा रहल
आ से हुअओ किए नइँ
जकरा हाथमे छैक
तंत्रक चाभी
बैसल अछि ड्राइभिङ्ग सिटपर
उएह ओझराएल अछि
निज स्वार्थमे ।
देशक ड्राइभर
जे क रहल अछि
अखुनका तंत्रके बदनाम,
जेकरा लेल देलैन्ह
कतेको प्राणक आहुति
जेकरा लेल गमाओल
बहुतो किछ
स्वाभिमानी
अभियानी,
से वर्ग कतियायल अछि
नइँ बूझि सकल स्वाद तंत्रक
तँए निराश अछि
उएह निराशा कतेकाेके
जगाबए चाहैए समशान
नचाबए चाहैए भूत
ओ जे भूत वर्षाे बरिस
नचैत रहल छातीपर,
बनाैने रहल बाैक
जकडने रहल जिज्जिरसँ
लदने रहल गुलामी
पुस्त-दर-पुस्त,
ओही भूतके स्वागत लेल
उताहुल अछि किछ गिद्ध
जे नाेचत फेरसँ
तँए चलैए खुर्चाइल !
नइँ किन्नहु नइँ ।
जे भेटल अछि तकर रक्षा करैत
बाँँकी लेबाक अछि,
हँ बदलाब जरुरी अछि
लाेभी-पापी ड्राइभर,
जाहिसँ भ सकए रक्षा
तंत्रक
जे पहुँचए आमजनधरि
आब कागजी नइँ
सुच्चा गणतंत्र चाही
आ तैके लेल बाँँकी अछि
सङ्घर्ष अखनाे
स्वाभिमान,
पहिचान आ सम्मान ला ।





