काठमाण्डू, २४ अखारः मधेश प्रदेशमे मैथिली आ भोजपुरी भाषाकेँ सरकारी कामकाजक भाषाक रुपमे कार्यान्वयन करबाक मांग कएल गेल अइछ ।
नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठान, भाषा, कोष आ व्याकरण विभागद्वारा आइ आयोजित ‘मधेश प्रदेशमे सरकारी कामकाजके भाषा’ विषयक विचार गोष्ठीक वक्तासभ मधेश प्रदेशमे सबसँ बेसी बाजल जाएबला मैथिलीकेँ सरकारी कामकाजके मान्यता द क कार्यान्वयन करबाक चाही से मांग कएने अइछ ।
नेपाल प्रज्ञा–प्रतिष्ठानक प्राज्ञ सदस्य डा सूर्य प्रसाद यादव मधेश प्रदेशक आठ जिलामे मैथिली भाषा हरेक दृष्टिकोण सरकारी कामकाजके भाषाक तथ्यांकके अधारमे उपयुक्त देखा रहलासँ पूर्ण रुपमे कार्यान्वयन करबाक चाही बतौलैन । ओ कहलैथ, “सामान्यतः सरकारी कामकाजके भाषा निर्धारण राजनीतिक प्रक्रियासँ भेलोपर ई नितान्त संवैधानिक विषय छियै, एकर निर्धारण सम्बन्धमे प्रदेशमे प्रयोग भ रहल मातृभाषासभ मध्ये सङ्ख्यात्मक रूपमे पहिल स्थानके भाषाकेँ चयन करए पड़त ।”
नेपालके राष्ट्रिय जनगणना २०७८ विश्लेषणसँ मधेश प्रदेशमे बाजल जाएबला भाषासभ मध्ये मैथिली प्रमुख भेलासँ सरकारी कामकाजके भाषाक लेल सबसँ उपयुक्त रहल हुनकर कहब छैन ।
भाषा आयोगक अध्यक्ष डा गोपाल ठाकुर आयोग मधेश प्रदेशक लेल मैथिली, भोजपुरी आ बज्जिका भाषाकेँ सरकारी कामकाजके लेल भाषा आयोगसँ सिफारिस कएल गेल बतौलैन । राष्ट्रिय जनगणना २०७८ अनुसार मधेश प्रदेशमे मैथिली ४१.७३, भोजपुरी १८.८०, बज्जिका १८.४३ प्रतिशत छै ।
मधेश प्रदेश सरकार २०८१ माघ ९ गते भाषा आयोगके सिफारिसमे पड़ल भाषा मैथिली, भोजपुरी, बज्जिकासहित आओर दूटा भाषा हिन्दी आ अङ्ग्रेजीकेँ समेटैत सरकारी कामकाजके भाषाक रूपमे प्रदेशसभामे प्रस्तुत कएने छल ।
राष्ट्रिय जनगणना २०७८ अनुसार देशभैरमे जमा १२४ मातृभाषा भेटल छै । जाहिमे मधेश प्रदेशमे मात्रे ६० सँ बेसी मातृभाषा छै ।
मधेश प्रदेशमे भाषागत स्पष्टता प्रष्ट रहलासँ मैथिला आ भोजपुरीके स्थान मिलबाक चाही, एहिमे दु मत होबाक कोनो सवाले नै रहल नेपाल संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ धीरेन्द्र प्रेमर्षि कहलैन । मातृभाषाके मर्म नै बुइझ रहल व्यक्तिप्रति कटाक्ष करैत ओ कहलैन “नै होइ छै तँ समग्र देशमे एके भाषामे सांकेतिक आ लेखनमे ब्रेल लिपी अपनाएल जाए, जाहिसँ सबके एकरूपता होए।”
पत्रकार सुरेश यादव सप्तरी, सिराहा, धनुषा, महोत्तरीसहितक मधेश प्रदेशक सब जिलामे मैथिली भाषा सबसँ बेसी भेलासँ मैथिलीकेँ सरकारी कामकाजके भाषाक रुपमे प्रयोग कएलासँ जनहित हएत, एहिमे केकरो हिचकिचाहट नै होबाक चाही कहलैन ।





