धर्मेन्द्र झा आ भेषराज कार्की / रासस
काठमाण्डू, २५ साओन (रासस) : नेपालके सांस्कृतिक आ भाषिक विविधतासँ अइ ठाँमक चलचित्र उद्योगकेँ समृद्ध बनेबाक सम्भावना रहलोपर ताहिअनुसार उपलब्धि तँ प्राप्त नै भेल अइछ । नेपाली भाषाबाहेक अन्य स्थानीय भाषामे चलचित्र निर्माणके सङ्ख्या नेपालमे बहुते न्यून छै । खास क मधेश प्रदेशमे चलचित्र भवनके सङ्ख्या उल्लेख्य छै, मुदा स्थानीय भाषाक चलचित्र नै बनलासँ ओतेक नीक व्यवसाय नै भ सकल अइछ । मैथिली भाषामे चलचित्र निर्माण नै भेलाक बाद अन्य भाषाक चलचित्रके दबदबा बढ़ल अइछ ।
मैथिली भाषा नेपालके दोसर सबसँ अधिक लोकद्वारा बाजल जाएबला भाषा छी, मुदा सांस्कृतिक आ साहित्यिक समृद्धिके बादो चलचित्र निर्माण क्षेत्रमे तँ ई भाषा पाछु पड़ल अइछ । एकर कारण आ सम्भावनाबारे साहित्यकार, नाट्यकर्मी आ चलचित्रकर्मीसभ विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत कएने अइछ । साहित्यकार, कलाकार तथा गीतकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक अनुसार मैथिलीमे नेपाली वा भोजपुरी जकाँ व्यावसायिक आ पूर्ण तैयारी पूर्वक चलचित्र निर्माण नै भेल छै । नेपालेमे बनैबला चलचित्रसभ लाैलसासँ वा कम बजेटमे तैयार होइत छै । मैथिलीक चलचित्र निर्माणमे प्रोत्साहन नै देल जा रहल छै ।
“किछ छोट-छोट ‘भिडियो’ चलचित्रसभ बनल छै, मुदा व्यावसायिक रुपमे निर्माण कएल जाएबला चलचित्र नै बनल छै । एत साहसी लगानीकर्ताके अभाव अइछ । भाषा, साहित्य आ समुदायप्रति दायित्व बोध कएनिहार व्यक्तिसभके कमीके कारण मैथिली चलचित्र आगू नै बइढ़ सकल अइछ,” ओ कहलैन । मैथिली भाषामे निर्माण होएबला चलचित्र मिथिलाके कथा आ संस्कृतिकेँ समेटैत सीमित बजेटमे तैयार होएत तँ, धीरे-धीरे बजार बढ़त आ चलचित्रप्रति आकर्षण सेहो बढ़त साहित्यकार प्रेमर्षि बतौलैन ।
तराईमे चलचित्रके बजारके सम्भावनाकेँ ‘सस्ता जिनगी महग सेनुर’ जकाँ चलचित्र प्रदर्शनसँ स्पष्ट भेल पत्रकार तथा मैथिलीक प्राध्यापक श्यामसुन्दर शशी स्मरण केलैन । हुनक कहब अनुसार सन् १९९९ मे प्रदर्शन भेल ओइ मैथिली चलचित्र तराईके चलचित्र भवनमे महिनौँ प्रदर्शन भ व्यासायिक रुपमे सेहो बढ़िया आर्जन कएने छल । फिल्मी भाषामे ओइ समय ओ फिल्मकेँ ‘ब्लकबस्टर’ फिल्म कहल गेल छल ।
“महिनौँधैर प्रदर्शन भेल छल, दर्शकसभ ट्याक्टर, टायर गाडीसँ सिनेमा हलधैर जाइत छलै । ताहि समय भारतीय चलचित्रके बजारकेँ सेहो प्रभावित कएने छल । सिनेमा हलसँ अन्य भाषाक चलचित्र विस्थापित भेल छल मुदा से सम्भावना स्वदेशी चलचित्र निर्माणकेँ प्रोत्साहित नै क सकल”, मधेश आमसञ्चार प्राधिकरणक पूर्वअध्यक्ष साहित्यकार श्यामसुन्दर यादव कहलैन । मुरलीधरद्वारा निर्देशित चलचित्र ‘सस्ता जिनगी महग सेनुर’ भारतीय कम्पनीद्वारा निर्माण कएलोपर नेपालमे प्रदर्शनके अधिकार निर्देशक स्वयं लेने छल । मुदा, तकरा बाद कोनो प्रयाससभ सफलता नै पाबए सकल हुनकर कहब छैन ।
मिथिला क्षेत्रक चर्चित गायक रङ्गकर्मी सुनील कुमार मल्लिकके अनुसार, “मैथिलीभाषी क्षेत्रमे मैथिली चलचित्रके बजार नम्हर छै, मुदा अइ ठाँमक प्राविधिक आ दक्ष जनशक्ति स्थानीय स्तरमे अवसरमे उपलब्ध नै भेलासँ काठमाण्डू वा मुम्बईदिस पलायन भ रहल छै । अइसँ मैथिली चलचित्र निर्माणमे बहुत चुनौती बढ़ल अइछ ।”
हुनक कहब अनुसार भाषा अभियन्ता, साहित्यप्रेमी वा कलाकारके प्रयास लाैलसा टामे मात्र सीमित छै । व्यावसायिक रूपमे आगू नै बढ़लाधैर मैथिली चलचित्र दर्शककेँ नै आर्षिकत क सकत । नाट्यकर्मी कलाकार रमेशरञ्जन झाके अनुसार खास क वीरगञ्जसँ राजविराजके भूभागमे मैथिली भाषी समुदायके बहुत जेरगर उपस्थिति छै । एतेक नम्हर बजार भइयोक मैथिली चलचित्रके निर्माण न्यून होएब आर्थिक, सामाजिक आ प्राविधिक कारणसभ जिमेवार छै । तइयो, झा मैथिली चलचित्रके भविष्यप्रति आशावादी छैथ ।
“किछ छोटका चलचित्रसभ (लघु चलचित्र, डकुमेन्ट्री) बनल छै, मुदा पैघ व्यावसायिक चलचित्रसभ नै बनलासँ अइ ठाँमक प्रतिभाशाली जनशक्ति बाहरी उद्योगमे काज क रहल छैथ। मुदा, नयाँ पुस्ता नवीन सोच आ कथावस्तुसहित फिल्म बनाएत । वीरगञ्जसँ जनकपुरके बजारकेँ लक्षित करबाक प्रयास अवश्ये करत”, ओ कहलैन ।
किछ महिना पहिने प्रदर्शित भ चर्चित भेल चलचित्र ‘राजागञ्ज’के कलाकार आरती मण्डल राज्य आ सम्बन्धित निकाय मैथिली चलचित्र निर्माणकेँ प्रोत्साहन करबाक चाही से कहलैन । विभिन्न भाषाभाषीक चलचित्रमार्फत नेपालभैरके बजारकेँ एकीकृत कएल जाए सकैत छै से हुनक सोचमे अइछ । “हमरासभ विदेशी चलचित्र जकाँ मैथिली चलचित्रकेँ देखैबला दृष्टिकोणमे परिवर्तन करए पड़त तबे एकर सङ्ख्यात्मक वृद्धि कएल जा सकै छै । अखनो चलचित्रकर्मी तराईके बजारकेँ पहिचान नै क सकल छै। सम्भावना बहुत छै । मुदा, से सम्भावनाकेँ प्रमाणित करैबलाके कमी छै”, कलाकार मण्डल कहलैन ।
‘फिचर चलचित्र’ निर्देशक बनल पूर्णेन्दु कुमार झा किछ सालसँ ‘लेबर’ चलचित्रके तैयारीमे लागल छैथ । प्रारम्भमे ओइ चलचित्रकेँ मैथिली भाषामे तैयार करबाक घोषणा कएने निर्देशक झा बजारके अध्ययन कएलाक बाद चलचित्रकेँ आब बहुभाषामे बनाएल जेबाक उल्लेख केलैन।
ओ समृद्ध भाषा आ नम्हर बजार भेलोपर मैथिली चलचित्र गति नै लेबाक मुख्य कारण आर्थिक लगानीके अभाव, वितरकके उदासीनता, प्राविधिक जनशक्तिके पलायन आ हिन्दी–भोजपुरी चलचित्रके प्रभुत्व रहल ओ कहलैन। “बजार नै छै से भाष्यके कारण हमरासभ मैथिली चलचित्रकेँ आगू बढ़ाबैमे कठिनाइ भ रहल छै । तइयो, पछिला समय नयाँ पुस्ताद्वारा भ रहल प्रयाससभसँ जल्दीए नयाँ समयके सुरूआत करतै से विश्वास छै”, निर्देशक झा कहलैथ, “मैथिलीमे दर्शक तँ छै मुदा चलचित्र नै छै ।”
ओ अगिला सालके मजदुर दिवसके अवसरमे बहुभाषी चलचित्र ‘लेबर’ निर्माण क प्रदर्शन करबाक योजनामे छैथ ।
चलचित्र विकास बोर्डक’ अध्यक्ष दिनेश डिसी बोर्डअन्तर्गत रहल उपसमितिमार्फत भाषाभाषीके चलचित्रकेँ प्रवर्धन करबाक काज क रहल बतौलैन । ओ कहलैथ, “हमरासभ प्रवर्धन करबाक सोच बनाैने छियै । अखन हमरासभ ऐन निर्माणके प्रक्रियामे छी, आबैबला समयमे मैथिलीसहित अन्य भाषाक चलचित्र निर्माणमे ऊर्जा बढत । चलचित्र निर्माणेमे कमी भेलोपर स्थानीय रुपमे नाटक, वृत्तचित्र निर्माण भ रहल थाह लागल अइछ, मुदा प्रोत्साहन आ प्रवर्धन करैमे बोर्ड सबदिन तत्पर रहत ।”
ओ कहलैन जे मैथिली भाषामे चलचित्र निर्माणक संख्या कम महसूस क मैथिली चलचित्रकेँ लक्षित करैबला महोत्सवमे सहकार्य सेहो कएने छी। “मैथिलीके चलचित्र सहित आन गतिविधि बढे़बाक लेल हमरासभ ओइ भाषाके सर्जकसभसँ सहकार्य बढ़ा रहल छी”, अध्यक्ष डिसी कहलैन।
सञ्चार तथा सूचना प्रविधि मन्त्रालयक सहसचिव एवम् प्रवक्ता गजेन्द्र कुमार ठाकुर कहलैन जे सरकारके ध्यान कोनो भाषाभाषी विशेषसँ बेसी समग्र नेपालमे बनैबला चलचित्रकेँ प्रवर्धन करैमे केन्द्रित छै। ओ कहलैन, “हमरासभ चलचित्र उद्योगकेँ मजबूत बनेबाक लेल ध्यान केन्द्रित क क गतिविधि क रहल छी। स्टुडियो निर्माण, चलचित्र ऐन सहितक काजसँ भविष्यमे सब भाषाक चलचित्रकर्मीकेँ लाभ होएत, ताहिमे हमरासभ विश्वस्त छी। हमरासभ समग्रमे नेपाली चलचित्र आ सब भाषामे बनैबला चलचित्रकेँ नीतिगत रूपसँ सुविधा पहुँच जकाँ काज क रहल छी।”
केन्द्रीय चलचित्र जाँच समितिक अध्यक्ष सेहो रहल मन्त्रालयक प्रवक्ता ठाकुर कहलैन जे हम मन्त्रालयमे कार्यभार सम्हारलाक बादसँ कोनो मैथिली भाषाक चलचित्र जाँचपासक लेल आएल से स्मरण नै छै। प्राध्यापक शशीक अनुसार, चलचित्र एकटा सशक्त माध्यम छियै जे भाषा आ संस्कृतिक प्रवर्धनमे महत्वपूर्ण योगदान द सकैत अइछ, मैथिली सेहो अपवाद नै अइछ। ओ कहलैन, “मैथिली चलचित्र सांस्कृतिक पहिचानकेँ विश्वव्यापी रूपसँ चिन्हाब क क्षमता राखैत छै, मुदा एकरा लेल सामूहिक प्रयास अनिवार्य अइछ।”
दोसर विश्लेषक, मधेश आमसञ्चार प्राधिकरणक पूर्वअध्यक्ष यादवके कहब छैन जे, विडम्बना ई छै जे बजारके सम्भावना रहितो प्रोत्साहनके कमीक कारणेँ मैथिलीमे चलचित्रसभ निर्माण नै भ सकलै। तहिना, दोसर अध्येता कलाकार सुनील मल्लिक कहैत छैथ, “चलचित्र राष्ट्रनिर्माणक माध्यम सेहो छियै। देशकेँ एकता सूत्रमे बान्हैबला एकटा सशक्त माध्यम सेहो छियै। विविध भाषामे चलचित्र निर्माण नै भ सकल तँ समग्र राष्ट्रनिर्माण प्रक्रियाक गति सेहो अस्थीर भ सकैत अइछ। राज्य एकरा बारेमे गम्भीर भ क भाषाभाषी चलचित्र निर्माणक प्रक्रियाकेँ प्रोत्साहित करबाक चाही।”
चलचित्र विकास बोर्डक तथ्याङ्कअनुसार २०६७ सालमे ‘सजनाके अङ्गनामे सोलह सिङ्गार’, वि.सं. २०७० सालमे ‘जान’, २०७१ सालमे ‘लभ मिथिलानगर’, २०७२ सालमे ‘धारक पार’, २०७३ सालमे ‘मधेशी पूत्र’, ‘सलहेस (द पिपल्स हिरो)’, ‘राधासङ मोहन’ आ ‘श्री शम्भुनाथ धाम’, २०७४ सालमे ‘औकात’, ‘सजना सिनेहिया’ आ ‘२ दिल १ जान’, २०७५ सालमे ‘बदला आइग क’, २०७६ सालमे ‘छिन्नमस्ता जय सखडेश्वरी’, २०७७ सालमे ‘सजनाके अङ्गना’ आ ‘मधेशी पुत्र रिर्टन्स’, २०७९ सालमे ‘त्रास एक खौफ’ आ २०८० सालमे ‘लेबर’ नामक लघु चलचित्र तथा चलचित्र दर्ता भेल अइछ। एहिमेसँ किछु निर्माण भेलाक बादो अधिकांश निर्माण नै भ सकल अइछ।
बोर्डक तथ्याङ्कअनुसार अखन मधेश प्रदेशमे २५ टा चलचित्र भवन सञ्चालनमे अइछ। ई चलचित्र भवनसभमे स्वदेशी चलचित्रक तुलनामे विदेशी (हिन्दी) भाषाक चलचित्र बेसी व्यापार क रहल अइछ। विशेष क क मधेशमे मैथिली चलचित्रकेँ केन्द्रित गतिविधि बढेलासँ दर्शकके संख्या बढ़त । सङ-सङे धीरे-धीरे लगानीकर्ता सेहो आकर्षित होएत, से विश्वास मैथिली भाषी चलचित्रकर्मीसभक अइछ। ओसभ मैथिली चलचित्र निर्माणकेँ केवल व्यावसायिकतासँ मात्र नै जोइड़ क भाषा आ संस्कृति संरक्षणक रूपमे सेहो देखबाक लेल जोड़ देलैन अइछ।





