राजविराज १० भादव । तराई–मधेशक सभ जिलामे आजुक दिन चौठचन्द्र अर्थात् चौरचन पर्व धूमधाम सँ मनायल जा रहल अइछ ।
भादव शुक्ल चतुर्थी दिन पड़निहार एहि पर्वमे व्रतधारी स्त्रीसभ सबेरे सँ निराहार रहि संझ उदित चन्द्रमा केँ अर्घ दैत छइथ । धार्मिक जनमान्यता अनुसार भगवान गणेशक श्राप सँ मुक्ति पबाक लेल चन्द्रक पूजा करबाक परम्परा सुरु भेल छल । एहि दिन चन्द्रमा दर्शन करनिहार पापमुक्त भऽ मनोकामना पूर्ण होइत अइछ, एहन विश्वास अइछ ।
मिथिला नरेशक समय सँ सुरु भेल कहल जाएबला अइ पर्वमे स्त्रीसभ लड्डु, पुरी, खीर, खजुरिया, फलफूल आदिकेँ सजाबैत छथि । कुम्हारक बनौल नब माटिक भाँड़मे जमौल दही अर्पण करबाक विशेष चलन अइछ । अइ पावैनमे परिवारक सदस्य मात्र नइँ, अपितु पशुपक्षीक नामसँ सेहो दही अर्पण करबाक परम्परा अइछ । संझबेला उदित हँसुआ आकारक चन्द्रमा केँ अर्घ दए परिकार समर्पित करल जाएत अइछ आ तकर बाद प्रसाद रूपमे ग्रहण कएल जाएत अइछ ।
स्थानिय भाषामे ‘मड़र’ कहल जाएबला पिंढीमे पूजा उपरान्त परिवारक पुरुष बसबाक चलन अइछ । तथापि स्त्री–पुरुष समानताक चर्चा संग ई परम्परा परिमार्जनयोग्य होएबाक आवाज उठि रहल अइछ । चौरचन मिथिला–मधेशक प्राचीन लोकपर्व मानल जाएत अइछ जे परिवार आ पशुपक्षी दुनूक कल्याण आ समृद्धिक कामना करैत अइछ ।”





