महोत्तरी, १ कात्तिक: सौरमासक कात्तिक सङ्क्रान्तिक दिन आइ अइ बेर दीयावाती (तिहार) पावैन शुरू कएल जा रहल अइछ । महोत्तरी सहित मिथिलाक्षेत्रमे कात्तिक कृष्ण त्रयोदशीसँ कात्तिक शुक्ल द्वितीयाधैर रहैबला दीयावातीके पहिल दिन आइ ‘धनतेरस’ मनेबाक तैयारी अइछ ।
मिथिलाक जनबोलीमे ‘दियावाती’ कहल जाएबला ई पावैनकेँ ‘यमपञ्चक’ सेहो कहल जाइत अइछ । पावैनके पहिल दिन आइ धातुके नव समान जोइड़ क लक्ष्मीक आराधना करैत ‘धनतेरस’ पावैन मनेबाक तैयारी अइछ । सामान्यतः पाँच दिनक ई पावैन अइ बेर तिथिक भोग घटबढसँ छ दिनक भेल अइछ । आइ दुपहर १३:२३ बजेक बाद त्रयोदशी भेलाक कारणेँ अइ तिथिक साँझ आइ ‘धनतेरस’ मनाएल जाएत ।
मिथिलामे पावैन आ तिथि प्रयोजनसँ जुड़ल कार्यसभ विद्यापति आ मिथिला पञ्चाङ्गके आधारमे निर्णय करबाक चलन अइछ । दुपहरमे त्रयोदशी सुरू भ क आइ ‘धनतेरस’ मनाएल गेलापर सेहो अइ तिथिक कागपूजा काल्हि रैवदिन होएत । एहिना लक्ष्मीपूजा आ गाैपूजा सेहो एक दिन आगाँ-पाछाँ पड़ल अइछ । सामान्यतः दिवालीक पहिल दिन त्रयोदशी तिथिमे कागपूजा आ धनतेरस आओर अमावश्यामे गाैपूजा आ सन्ध्याक बाद लक्ष्मीपूजा कएल जेबाक चलन अइछ । मुदा अइ बेर अमावश्या सोमदिन पड़लाक कारण ओइ दिन लक्ष्मीपूजा कएल जाएत, मैथिल कर्मकाण्डक ज्ञाता बर्दिबास–२ क निवासी पण्डित दिनेश कुमार झाके कहब अइछ।
दीपावली मुख्य रूपसँ धनधान्यक देवी लक्ष्मीक पूजाआराधना कएल जाएबला पावैन भेलाक कारण पहिल दिन लक्ष्मीकेँ प्रसन्न करबाक लेल ‘धनतेरस’ करबाक परम्परा चलल वृद्धपुरान कहैत छैथ । मिथिला क्षेत्रमे ‘दियावाती’के पहिल दिन बजारसँ किइन क आनल गेल धातुक गहना वा बासनकेँ लक्ष्मीक प्रतिमा स्थापित कएल गेल स्थानपर पूजा क ई पावैन विधिवत सुरू करबाक परम्परा अइछ । सन्ध्याकालमे दीप प्रज्वलनक सङ ‘धनतेरस’क पूजा क ‘दियावाती’ पावैन सुरू कएल जाइत अइछ ।
पावैन विशेषक कारण ताम, पीतर आ काँस एवम् सोना-चाँदीक गहना बनाएल जाइत अइछ । मिथिलामे आइ किनल समान शुभफल दैबला, टिकाउ आ नाफामूलक होएत, से जनविश्वास रहल अइछ । (रासस)





