नियात्रा
धर्मेन्द्र विह्वल
नेपाल सँ बाहर रहनिहार बहुतोकेँ नेपालमे सेहो कुम्भ छै आ एतऽ मेला लगै छै तकर जानकारीक अभाव भऽ सकैत छैन, मुदा ई सत्य छै जे नेपालमे प्रचाीन हरिद्वारऽक रुपमे चतरा नामक स्थान प्रख्यात छै आ एतऽभारतऽक प्रयाग, हरिद्वार, नासिक, उज्जैनेजकाँ कुम्भ लगै छै आ एहि विशेष अवसरिपर भव्य मेलाक आयोजना कएल जाइत छै ।चतरा मूलतः वराहक्षेत्रक नामसँ प्रसिद्ध अइछ ।ई स्थान कुम्भनगरीरुपेँ सेहो जानल जाइत अइछ । एहि हिसाबे ई स्वीकार कएल जा सकैत छै जे चतराधामसमेत विश्वमे पाँचटा कुम्भनगरी छैक जतऽ कुम्भ मेलाक आयोजन होइत छै ।
नेपालऽक सुनसरी जिलाक बराहक्षेत्र नगरपालिकामे अवस्थित चतराधाम धार्मिक, आध्यात्मिक आ भौतिक महत्वक क्षेत्र अइछ । प्रसिद्ध पर्यटकीय क्षेत्र धरान सँ १४ आ इटहरी सँ १६ किलोमीटरके दूरीपर स्थित चतरधाम स्वयंमे एक पवित्र क्षेत्र अइछ । सप्तरी जिलाक फत्तेपुर सँ सेहो एतऽ पहुँचल जा सकैत अइछ । तहिना सिन्धुली जिलाक भिमान होइत उदयपुर जिलाक कटारी, गाइघाट आ बेलटार होइत एतऽ पहुँचल जा सकैए । हम विगतमे ई सब रस्ताक प्रयोग कऽ अनेकोबेर चतराधामऽक यात्रा केने छी, मुदा एतऽ संगममे स्नान कऽ भगवान वराहऽक दर्शन करबाक शौभाग्य एखन धैर नै प्राप्त भऽ सकल अइछ ।विगतमे चतरा सँ पहाड़क रस्ता भऽ धनकुटा, भोजपुर, खोटाङलगायत पूर्वी पहाड़ी जिलाक परम्परागत पैदल यात्रामार्ग प्रचलनमे रहए । एखनो ई मार्ग कोनो ने कोनोरुपेँ अस्तित्वमे अछिए । एहि क्षेत्रमे जहिया पक्की सड़क नै रहैक तहिया चतराधाम पूर्वी नेपालऽक पहाड़ी जिलाहेतु मुल जंकसन मानल जाइत छलै । एतऽधैर लोक गाड़ी सँ आइब एतऽ सँ पहाड़क पैदल यात्रा करैत छल, मुदा आब ओ बाध्यताक अन्त भऽ गेल छै । आब धरान सँ धनकुटा, भोजपुर, खोटाङ, संखुवासभा, तेह्रथुमलगायतके पहाडी जिलाक यात्रा गाड़ी सँ कएल जा सकैत छै ।
हम एहिबेर काठमाण्डू सँ२०८२ सालऽक कार्तिक ४ गते अर्थात सन २०२५क अक्टुबर २१ तारिखऽक भोरेप्रस्थान केने रही ।एहि यात्रामे एहिवेर हमरासँग पत्नी मुन्नी आ पुत्र आदित्य सेहो सँगे रहैथ । ओना आदित्य एहि सँ पहिने एहि मार्गमे एकबेर यात्रा कऽ चुकल छलैथ मुदा गाईघाटके बाद मुन्नीक ई पहिल यात्रा रहैन । सिन्धुली जिलाक भिमान सँ कमला नदीक किनारेकिनार भलुवाही, डकाहा आ दुधौली होइतउदयपुर जिलाक कटारी नेपालटार, गाईघाट, वेलटार होइत चतराधाम पहँुचल रही । दुधौलीक बाद सिन्धुली जिलाक सीमा समाप्त भऽ उदयपुर जिलाक सीमान प्रारम्भ होइत छै । दुधौली पहुँचऽ सँ कनिए पहिने कमलाजी दहिना मुइड सिरहा जिलामे प्रवेश कऽ माड़र होइत भारतदिसि बहि जाइत छैथ । एहि रस्ते यात्रा केनिहारकेँ गाइघाटलग त्रियुगा नदी सँ भेट होइत छैन ।
हमरासभऽक पुरान गाम सिरहा जिलाक गोविन्दपुर–वस्तीपुर (हाल लहान नगपालिकाक वार्ड नम्बर २७ं)अइछ । यात्रामे आगाँ बढ़ैतकाल कटारी सँ आगाँ नेपालटारऽक नजदिक हम मुन्नी आ आदित्यकेँ दहिना कातऽक चुरिया पहाड़ देखबैत कहलियैन–इएह पहाड़क ओहिपार छै सिरहा जिलाक शोभापुर गाम आ ताहि सँ कने सटल छै वस्तीपुर । जँ ई पहाड़बीचमे नै रहितै तँ एतऽ सँ अपनासभऽक गाम कनिए दूर रहितए । हँ, कहिओकाल भूगोलक बाध्यता लोककेँ बाँइट दै छै । ओना वस्तीपुर एतहि बुइझ पड़ै छै, मुदा ओतऽ पहुँचबालेल विद्यमान सड़क व्यवस्थाक कारण कम सँ कम तीन÷चाइर घण्टा लाइग जाइत छै ।हमरा बुझने नेपालऽक संघीय संरचना व्यवस्थापनमे भूगोल वेरवेर समस्या बइन ठाड़ भेल अइछ । जँ एना नै होइतै तँ सिन्धुली आ उदयपुर जिलाक चुरिया पर्वत शृंखलासँ जुडल भूगोल तँ मधेश प्रदेशमे रहितै ने ? खायर जे होइक, भविष्य एहि बातऽक मूल्यांकन करबे करतै ।
कने बात विषयान्तर भेलसन लगैए । अमरालोकैन रस्तामे पडऽबला कमला आ त्रियुगा नदीक बात कऽ रहल छलौं । ई दूनु नदीक मिथिला सभ्यता आ संस्कृति सँ अत्यन्त महत्वपूर्ण सम्बन्ध रहि आएल अइछ । एहि क्षेत्रक प्रत्येक मैथिल कमला आ त्रियुगाकेँ पुजैत अइछ । गोहरबैत अइछ । कृषि कर्मक मूल आधार रहल कमला आ त्रियुगा दूनु नदी जीवनदायिनी अइछ कही तँ अन्यथा नै हएत । भिमानके बाद गाइघाट धैरऽक चुरिया आ महाभारत पर्वत शृंखलाबीचक खेतीयोग्य मैदानी (दुन) भाग, जकरा नेपालमे भित्री तराई(मधेश)सेहो कहल जाइत छै, मे मूलतः दनुवार जाइतक लोकऽक वसोवास अइछ । गाइघाटअबैतअबैत थारु जाइतक वसोवास घनगर होबऽ लगैत छै ।
रस्ता किनारऽक खेतमे लहलहाइत धनखेती । वाह ! अत्यन्त मनमोहक आ रमणीय दृश्य । ई क्षेत्र सँ यात्रा करैतकाल किनको लाइग सकैए जे ठीके ई उएह क्षेत्र छै जे नेपालक अन्न भण्डार कहबैत होइक । एतबए नै, मैथिल सभ्यता सँ अन्यान्येश्रित सम्बन्ध रहल ई दूनु संस्कृतिक समग्र मिथिलाक विकास आ निर्माणमे महत्वपूर्ण भूमिका रहल बात स्वीकार करहि पड़त । गाईघाटऽक आसपास भेटऽबला त्रियुगा फत्तेपुर आ कञ्चनपुर होइत आगाँ बढ़ैत सप्तकोशीमे मिलि जाइए । एहि रस्ते यात्रा करी तँ ई दूनु सभ्यता आ संस्कृतिक अवलोकन कऽ स्थानीय जवनजीवन सँ एकाकार भेल जा सकैत अइछ ।
हमसभ हायस वस सँ यात्रा कऽ रहल छलहुँ । वसमे सवार आन लोकऽकँे खासे कोनो मतलब नै छलैए, मुदा समग्र मिथिला संस्कृतिमे रुचि रखनिहार हमरालोकैनहेतु ई यात्रा बहुत महत्वपूर्ण रहल बुझाएल । हमसभ अपनामे मैथिल, थारु आ दनुवार जाइतऽक लोकऽक सँगहि कमला, त्रियुगा नदी, एहि क्षेत्रक कृषिकर्मलगायत समग्र सभ्यता आ संस्कृतिक चर्चा करैत आगाँ बढैÞत जा रहल छलौं । उदयपुर जिलाक मुख्यालय गाइघाट त्रियुगा नागरपालिकामे अवस्थित अइछ । एतऽ सँ कने आगाँ बढलाक बाद अबै छै चौदण्डीगढ़ी नगरपालिका जे किरातकालीन सभ्यताक केन्द्रक रुपमे परिचित अइछ । एकरामादे दोसरवेर चर्चा करबाक प्रयास करब । चौदण्डीगढ़ीक बाद अबैत छै वेलका नगरपालिका । वेलका पहाड़ सलहेस सभ्यता सँ सेहो सम्बद्ध रहल मानल जाइत अइछ । गाइघाटमे क्रियाशील पत्रकार अजय साहके मानब छैन जे स्थानीय लोकऽसभ ई जगह सलहेसक इतिहास सँ सम्बद्ध रहल मानैत छैथ ।
वेलका सँ आगाँ बढ़लाक बाद अबै छै सप्तकोशी नदी । एहि पार उदयपुर आ ओहि पार सुनसरी जिला । इएह जगह चतराधामऽक रुपमे प्रख्यात अइछ । हमसभ सप्तकोशी नदीपर बनल पुलपर सँ यात्रा करैत ओहिपार सुनसरी अर्थात मूल चतरा भूमि पहुँचगेल छलौं । एतऽ अबैतअबैत दिनऽक करिव साढे तीन बाइज गेल रहए । समयक चाप क्रमशः बइढरहल छलए । मुन्नीकेँ एतऽ कने विलमऽके इच्छा रहितो अवस्था हमरासभऽक प्रतिकुल छलए । पहिल तँ हमरालोकैन सार्वजनिक गाड़ीमे यात्रा कऽ रहल छलौंं, हमरासभऽक अनुकूलँे गाड़ी नै ने चलत । दोसर, समयक दवावसेहो तीव्र भऽ रहल छलए, हमारलौकैनकेँ आइए नेपालऽक पूर्वी सीमान अर्थात मेची नदीक किनार पहुँचबाक छलए । तएँ ओतऽ नै रुइक हमरालोकैन आगाँ बढ़लौं, मुदा वसेमे सँ वराहक्षेत्रक अध्ययन अवलोकन केलौं ।
पहाड़दिसि सँ सातटा सहायक नदी (भोटेकोशी (सुनकोशी), दूधकोशी, इन्द्रावति, तामाकोशी, लिखु, तमोर आ अरुण) मिलि निर्मित सप्तकोशी चतरा अबैत छैथ आ चतरा सँ शुरु होबऽबला मैदानी भागमे कोशी चतरैत (फैलैत) बहऽ लगै छैथ । शायद सएह कारण भऽ सकैए जे एहि जगहक नामे चतरा पडि़गेल हुअए । चतरामे सप्तकोशी आ कौकाह (कौशिकी) नदीक संगमअवस्थित छै आ श्रद्धालु इएह संगममे स्नान कऽ भगवान वराहसमक्ष स्वयंकेँ समर्पित करबाक प्रयत्न करैत अइछ ।
कुम्भ मेलाक आयोजनाक कारणचतरधाम विशेषरूप सँ लोकप्रिय अइछ । नेपालके प्रथम जगद्गुरु बालसन्त मोहनशरणदेवाचार्य महाराज श्रीके परिकल्पनाक आधारपर २०५९ सालमे पहिलबेर एतऽ महाकुम्भ मेलाक आयोजन कएल गेल छलए । कुम्भ मेलामे लाखों भक्तक सहभागिताक बाद एहि क्षेत्रकेँ अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर प्रसिद्धि प्राप्त भेल बात सुनसरीक पत्रकार धु्रव ढकाल बतौलैन ।

हुनका मोताबिक चतराधाममे सप्ताहमे दू दिन शुक्र आ शनि कऽकौशिकी–गंगा आरतीक आयोजन कएल जाइत अइछ । पत्रकार ढकालऽक कहब छैन–पछिला दिनमे ई आरतीक आयोजनपर्यटकीय आकर्षणऽक एक प्रमुख केन्द्र बनैत जा रहल अइछ ।
वराहक्षेत्रकेँभगवान विष्णुक वराह अवतार सँ जुड़ल पवित्र स्थान मानल जाइत छै । इतिहासऽक जानकार लेखक अजयकुमार झा पौराणिक कथाक उल्लेख करैत कहैत छैथ, हिरण्याक्ष ब्रह्मसाधना कऽअमरत्वक वरदान माग केलक, मुदा ब्रह्माजीजानवरके छोइड़ मनुष्य, देवता, यक्ष, किन्नर ककरो हाथ सँ मृत्यु नै होबाक वरदान देलैन । हिरण्याक्ष वरदानमे किछु सुधार कऽ वचन लेलक जे मायक कोख सँ नै जन्मल जानवरमात्र ओकरा माइर सकत ।
वरदान भेटलाक बाद हिरण्यक्ष एहि धरतीपर सब ठाम तबाही मचबऽ लागल । ओ सोचलक जे जानवर तँ इएह पृथ्वीपर अइछ, जँ पृथ्वीए नै रहत तँ ओकरा केओ नै माइर सकैए । तएँ एहि पृथ्वीकेँ जलमे डुबा देल जाए तँ ओ स्वतः अमर भऽ जाएत । ई सोचऽक बाद ओ भिषण जलप्रपातऽके आमन्त्रण केलक ।विशाल तालकेँ फोइड़ जलप्रवाह तीव्र बनौलक । चहुदिस तवाही उत्पन्न भऽ गेल । ई देखि ब्रह्मा आ अन्य देवता चिन्तित भऽ विष्णु भगवानकेँ पूजा केलैन आ भगवान विष्णु वराह रुप धारण कऽ हिरण्याक्षऽक बध केलैन आ जगतऽक रक्षा केलैन । मानल जाइत अइछ जे भगवान विष्णु जतऽ वराह रुप धारण कऽ हिरण्याक्षक बध केलैन चतराधाम उएह जगह अइछ आ कालान्तरमे ई वराहक्षेत्रक नाम सँ प्रसिद्ध भेल । पत्रकार अजितकुमार झाक मोताविक एतऽ स्थित वराहक्षेत्र मन्दिरकँे विष्णु, वराह आ पृथ्वीक संगम मानल जाइत अइछ आ ई स्थान पृथ्वीकपहिल तीर्थस्थलक रुपमे चर्चित अइछ ।
उपर उल्लेख कएल गेल जे चतराधाममे पहिल कुम्भ मेला २०५९ सालमे आयोजन भेल छल । तकरबाद प्रत्येक १२–१२ वर्षपर पूर्ण कुम्भ आ ६–६ वर्षपर अर्ध कुम्भऽक आयोजन होइत आएल अइछ । तहिना चतराधाममे प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमामे मेला लगैत अइछ, आ मेलामे नेपाल तथा भारत सँ पैघ संख्यामे सन्त, भिक्षु आ भक्तलोकैन सहभागी होइत छैथ ।
चुरिया पर्वत श्रृंखलाकतलहटीमें स्थित चतराधामऽक मुख्य धार्मिक स्थलमें औलिया बाबा मठ आ सर्वेश्वर राधाकृष्ण मन्दिर शामिल अछि । लेखक अजयक अनुसार औलिया बाबा मठ क्षेत्रमें भैरव, काली, शिव, गणेश आ हनुमानऽक मन्दिरऽक सँग औलिया बाबाक गुदरी घर सेहो अइछ । अपन प्राकृतिक आ भौगोलिक स्थितिक आधारपर चतराकेँ श्री हरि दरबारक द्वार अर्थात् ‘हरिद्वार’ सेहो कहल जाइत अइछ ।
वराहक्षेत्रकेँ हिन्दू धर्मावलम्बीक अतिरिक्त किराँत धर्मालम्बीसेहो पवित्र तीर्थक रुपमे स्वीकार करैत अइछ । जँ सूक्ष्म विश्लेषण कएल जाए तँ एहि क्षेत्रक सम्बन्ध प्राचीन मिथिला सँ रहल बात मानल जा सकैत अइछ । ई जगह मिथिला आ किरात सभ्यताक संगमस्थल अइछ कही तँ अन्यथा नै हएत । ई ओ जगह अइछ, जतऽ सँ उत्तर–पूव दिशामे किरात आ दक्षीण–पश्चिम दिशामे मिथिला सभ्यताक सीमान प्रारम्भ होइत अइछ । प्राचीन मिथिलाक सीमानाक विश्लेषण करी तँ सभ्यता प्रसाऽरक बात विश्वसनीय लगैत अइछ । प्राचीन मिथिलाक पूर्वी सीमान कोशी आ उत्तरमे हिमालयक उल्लेख कएल गेल अइछ । सम्भव अइछ पूर्वी सीमाक रुपमे उल्लेख कएल गेल कोशी इएह अइछ आ हिमालयदिसिक यात्रासेहो एतहि सँ प्रारम्भ होइत छै ।
एतऽ १५ सओ वर्ष सँ पुरान सामाग्री, यथा पाथरऽक हतियार, वर्तनभाडा, ईँटा आदि पाओल गेल छै । प्रारम्भिक पुरातात्विक अध्ययनऽक आधारपर विगतमे एतऽ पैघ सभ्यता आ नगर रहल बातऽक अनुमान कएल गेल अइछ । लेखक अजयक कहब छैन–महत्वपूर्ण बात तँ ई जे एतऽ प्राप्त प्राचीन सामाग्रीसब मिथिला संस्कृति सँ सम्बद्ध रहल मानल जा सकैए । ओ कहै छैथ–भऽ सकैए ई सामाग्रीसब किरात सभ्यता सँ सेहो सम्बन्धित हुअए ।दू सभ्यताक संगमस्थलक बात जँ स्वीकार कएल जाए तँ अजयक बातऽक पाछाँ आधार बुझाइए । खायर जे से, एहि बातसभऽक निरुपण तँ ऐतिहासिक आ पुरातात्विक अध्ययनऽक आधारपर मात्र भऽ सकैए । आग्रह ई जे एहन अध्ययन शीघ्र होबाक चाही । हमसभ कुम्भनगरी सँ आगाँ बइढरहल छलौं । हमसभ दूर निकैल गेल रही, मोन–मस्तिष्कमे भगवान विष्णुम वराह अवतारऽक चीत्र बनैत जा रहल छलए ।





