नागार्जुन उर्फ बाबा यात्री: जेना कवितामे जनक्रान्तिक स्वर


रोशन जनकपुरी

राेशन जनकपुरी
नवम्बर ५ । मैथिली कवितामें प्रगतिवादी धारक शीर्षतम जनकवि बाबा यात्री जे हिन्दी मे नागार्जुनके नाम स प्रसिद्ध छैथ (बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’) , आई हुनक पूण्य तिथि अइछ ।

औघड़पन, स्वतः स्फूर्तता (अटोमेटिक राइटिंग), हुनक लेखनक विशिष्टता अइछ, जे कखनोकाल समाजवादी यथार्थवादी सैद्धान्तिकताके दृष्टि स किछु समस्या ठाढ़ करैत अइछ। तथापि ओ विचार स मार्क्सवादी आ लेखनमे समाजवादी यथार्थवादी प्रवृत्तिके पक्षधर छलाह, से स्पष्ट अइछ, आ ई हुनक रचना संसारके मूल स्वर अइछ।

मैथिली साहित्यमे बाबा यात्री सार्वकालिक श्रेष्ठमे स एक छइथ । हुनक विलक्षणताक आगु सब नत् अइछ, ई अलग बात अइछ जे समकालीन मैथिली साहित्य संसार मे हुनका हुनक साहित्यिक प्रवृत्ति स कटा क’ पूज’के चलन बेसी अइछ।

किछु व्यंग्यमे कहल जाय त हुनक साहित्यिक ‘प्राण’ बिना के ठठरी ढोबाक प्रवृत्ति बेसी अइछ। बाबा यात्रीके एकटा प्रसिद्ध कविता ‘परम सत्य’ के किछु अंश प्रस्तुत अइछ:

धन्य हे श्रमशील मानव – विश्वभरिमे व्याप्त
धन्य तोहर जाति !
……
आई नहि तँ काल्हि दानव दलक करबह अबस्से उच्छेद
कृषक श्रमिकक जीवनो केँ बनबिहह पुनिवेद
……
जयति जनता-जनार्दन भगवान
कविक वाणी करओ दीपित आलसीहुक हृदयमें अभिमान
विजयिनी जनवाहिनी-सङ्गसँ मिलित करओ ओहो-ओहिना अभियान
सत्य थिक संसार
सत्य थिक मानवसमाजक क्रमिक उन्नति-
क्रमिक वृद्धि-विकास
सत्य थिक संघर्षरत् जनताक ई इतिहास
सत्य धरती, सत्य थिक आकाश
परम सत्य मनुक्ख अपनहि थिक

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