सन्त कोठिपाल
‘सागर वीर कडारी’ बहुआयामिक व्यक्तित्वक रूपमे चिन्हल जाइत छथि। पेसासँ शिक्षक रैहतो कवि, लेखक, पत्रकार, वकिल, संस्कृतिकर्मी, समाजसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, वृत्तचित्र काथाकार, पटकथाकार, निर्माता, निर्देशक, प्रकाशक, रचनाकार आदि अनेक रूपमे ई चिन्हल जाइत छथि। हिनक संकलन, सम्पादन, लेखनमे प्रकाशित ‘मैथिली लोकोक्ति सागर’ पोथीक तेसर संस्करण गत शनिदिन विमोचित भेल।
मैथिली भाषाक मौलिक अवयवसबक संरक्षणक दृष्टिसँ ई कृति आ कीर्तिके लेल रचनाकार सागरजीके चारुदिससँ साधुवाद भेटरहल छन्हि।
मैथिली लोकोक्ति सागर मैथिली भाषा साहित्यक कहबी, बुझौवल, फकड़ा, डाक-वचन जेहन उपाख्यानक एक अनुपम संग्रह थिक। १ हजार ११ कहवी, ५ सौ १४ बुझौवल आ २ सौ २२ फकड़ा एवम् डाक वचन मिलाक’ १ हजार ७ सौ ४७ टा उपाख्यान एहि संग्रहमे संकलित अछि। एतेक विशाल संख्यामे कहवी, बुझौवल, फकड़ाक संकलन क’ जनजनमे प्रसार करबाक हिनक योगदानके विवेचन निश्चय एक दुरुह चेष्टा थिक।
पोथीमे समाविष्ट उपाख्यान मिथिलाञ्चलक सप्तरी आ सिरहा जिल्लाक संकलन मात्र थिक। अर्थात् सम्पूर्ण क्मिथिलामे प्रचलित कहवी, फकड़ा आदिके संकलन त’ आर कतेक अधिक होयत। मैथिली भाषा लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकगीत आदिसँ भरलपुरल भाषा अछि, से लोककेँ प्रायः बुझल छन्हि, मुदा एहि पोथीक अवलोकनसँ, मैथिली हज्जारो उपाख्यानसँ सेहो समृद्ध अछि, से जाइन मन गदगद भ’गेल।
लोकोक्ति आ कहवी
लोकोक्ति शब्द संस्कृतसँ आयल अछि। बातचितमे विलक्षणात्मक दृष्टिसँ जखन जे व्यञ्जनाक प्रयोग भेल से शब्दत: लोकोक्ति थिक। मैथिलीमे ‘कह’ भाव’क विन्यास होइत ‘कहवी’ भेल अछि। जेना- ‘कह’ से कहनाई, कहु, कही, कहलक, कहथिन, कहथुन, कहावत आदि कहल जाइत अछि।
लोकके लवज आ बोलीवचनमे सेहो अपन-अपन बाइन देखल जाइछै। कतेक लोक बातबातमे कोनो खास बोली दोहरावैत अछि। जेना- अथि, किकहैछै, जेनाकी, मतलब आदि। किछ तेहने बाइन साझा जनबोलीमे सेहो प्रचलित छै, जकरा कहवी कहैछै। जेना- “ठेस लाग्ने बुद्धि बढए”, “भाइ-भैयारी भैंसी सिङ, जखने जन्म तखने भिन”, “बाडीके पटुवा तीत”, “नढिया देलक खिखिरके नोत”, “एके माघे जाड नै जाइछै” आ आओर अनेक अद्भुत कहवीके वास्तविक सागर सागरजीके लोकोक्ति सागर अछि।
कहवी लोक-संवादके एकटा हिस्सा छियै, जे बातचितके क्रममे अलंकृत भावमे व्यक्त होइत रहैैछै। कहवी रोचक-घोचक रूपमे बातचितमे सन्निबद्ध रहैत स्वस्फूर्त रूपमे बेर-बेर अवैत रहैछै। कतेक कहवी अपन मौलिकता, विशिष्टता आ लोकप्रियताक लेल प्रतिष्ठित रैह मैथिली भाषाकेँ मनभावन बनौने छै।
मिथिलाक उद्यमशील जीवन कलौके बाद किछ काल ओंघडाइतमे आ तब जमधटमे बितैछै। जमधटमे बात-बातमे लोकक बोलीसँ कहवी उचरैत रहैछै। जाडमे घूर-तापैतकाल कहवीके छोर लागल रहैछै। “पेटमे नहिएं सिङमे तेल”- एकटा कहवी छियै, जे अपन खास कथनके लेल पर्यायके रूप लेनेछै। जेना दोसरतेसर कहवी- “कौआके सराप्ने बेङ मरतै”, “एक आना मुर्गी, न आना मसल्ला”, “छोट खिखिरके मोट नाङैर”, “सतुवासंगे घून पिसाय”, “फुसियाह साँइलेल नीन कामै” आ एहने अनेक सनगर, रसगर, श्लील-अश्लील, राग-उपराग, व्यंग्य-परिहासपूर्ण कहवीसँ पोथी भरल अछि। हजारौँ कहवीके संकलन मामूली बात नै भ’सकए।
लाल बुझक्कड आ बुझौवल
मिथिलाक सामाजिक संवादमे प्राचीन कालसए लाल बुझक्कड़ एक अत्यन्त रोचक आ अद्भुत पात्रके रूपमे सदिखन जीवन्त रहल अछि। आइकाल्हि त मोबाइलके ‘मिम्स’ बडका लाल बुझक्कड बनिगेल अछि; एआई जकर गुरु। मिथिलाक कोनो गाम होय, एकटा ने एकटा लाल बुझक्कड भेटबे करत। बुझक्कड, मतलब जे लोकवेद नहि बुझय से बात छनेमे बुइझजायबाला गपाष्टक, गपड़चौथ। लाल बुझक्कड विनोदक उस्ताद होइत अछि, जे जमधटमे रङरङके गप्प द’ मजमा जमेने रहल। ओहिमे उठल कोनो अबुझ बातमे तुरत अडकल क’ फट्सँ किछ बता देलौं, से लाल बुझक्कड। लाल बुझक्कडके गप्पकेँ लोक यथार्थ नै, हँसीठट्ठा आ विनोदमे लैत अछि। एहने बुझक्कडक श्रीमुखसँ बुझौवल बहराइत रहल। बुझौवल एक प्रकारके प्रश्नयुक्त वाक्य होइत अछि। जहिमे कोनो वस्तु वा विषयके लक्षण या गुण घुमा-फिराक’ भ्रामक रूपमे पुछल जाइत अछि, जे बूझव या ओकर समाधान देव जरुरी होइत अछि। ज्ञान, मनोरञ्जन आ चातुर्य देखाब’लेल बुझौवल जनबोलीके हिस्सा बनैत गेल। मिथिलाक गामघरमे एहेन सैकडो बुझौवल प्रचलित अछि। सागरजी मिथिलाक गाम-गाम घुइमके ५१४ टा एहेन बुझौवल संकलन क’ प्रकाशित केलनि, से निश्चय कीर्तिमानी कार्य थिक। “नौ मन गदही बारह मन पेट, केहेन बेटा जन्मल बापोसे जेठ”- बोल की छियै?, “अलमे जल मिर्दङमे पाइन, जे जाने से बडका ज्ञाइन?”- बोल की भेलै?, तहिना “चाइर गाछ चाइर ठाम, फूल झडे एके ठाम”- ले जवाब दे। एहेन दिमाग दौडावबाला अनेक रोचक बुझौवल ई पुस्तकके पठनीय बनेनेछै।
फकड़ा आ डाक वचन
‘पोथीमे पाँच सौसे बेसी फकड़ा देलगेल अछि। “कहैत लजाइछी, नै कहु परत गाइर। सौसके पुतोह, भेल ससुरक महताइर।।” एहेन प्रकारके जनबोलीके फकड़ा कहैछै। अहि फकड़ाक अर्थ छै, जे “नवप्रसूता पुतोह ससुरके भात परसे गेली आ लुघरैतकाल हुनक स्तनक धार थारीमे चुइव गेलनि।” तहिना, “बौका लौका कदिमामे झोर, बेला बेगले लगेल चोर”, “अट लेबे कि पट, तोहर बाप नङरकट” आ एहेन अनेक फकड़ाके सँग अनेक डाकवचन सेहो फकड़ा शीर्षकमे समाविष्ट अछि। फकड़ा’ एक व्यर्थ आ निम्न कोटिके पद्य मानल जाइत अछि, जे धियापुता खेलयमे बेसी प्रयोग करत अछि। प्रायः दादी-नानीसँ बौआबुची फकड़ा सिखैत अछि। कबीराहासब फकड़ा बेसी बाजल। सम्भवतः कबीेरहेसबसँ समाजमे फकडा फैलल बझाइत अछि।
पोथीमे किछु डाक वचन सेहो समावेश अछि। मिथिलामे डाक वचनकेँ सांसारिक यथार्थ मानल जाइछै। जेना- “सुख सुकराति देवउठान तकरे बारह करु लवान तकर बारह खेत खरिहान तकर बारह काटि लिअ धान”, “शुक्रके बादरी रहे शनिश्चर छाय, डाक कहे, डाकनी! बिनबरसे नै जाय।”, “उत्तम खेती मध्यम बेपार, निन्दित चाकरी भीख निदान” ईसब डाक वचन छियै। डाक वचनकेँ मैथिल जनजीवनके मार्गदर्शक मानल जाइछै। पूर्व कालमे ‘डाक’ नामक कोनो व्यक्तिद्वारा, कहवी आ फकड़ाक शैलीमे देल गेल सत्यकथनकेँ डाक वचन कहल गेल छै, जे प्रायः प्राकृतिक-सामाजिक व्यवस्थाकेँ साहित्यिक सूत्रमे बुनल गेलछै। डाक वचन पोथीके आकर्षक विषय थिक, जे पाठकके लेल अत्यन्त ज्ञानवर्धक अछि।
विमोचन समारोहक उदगार
पुस्तकक विमोचन करैत प्रमुख अतिथि, विशिष्ट अतिथि एवम् आन वक्तालोकनि मैथिली लोकोक्ति सागर पोथीक संकलक, प्रकाशक पंक्तिके साधुवाद देलनि। रचना आ रचनाकार दूनुके प्रशंसा करैत ओ लोकनि संग्रहक परिमार्जन आ डिजिटलाइजेसनके लेल देहि सुझौलनि।
समारोहक प्रमुख अतिथि पूर्व प्रमुख निर्वाचन आयुक्त डा. एपी यादव मैथिली रचनाक अकाल पडल समयमे पोथीके ‘बीआ’क संज्ञा दैत बतोलनि जे ई बिआ अंकुरैत गाछी बनत आ तैसँ हज्जारो हज्जार बिआ फलित होयत। हमसब अपन बालबच्चाके मैथिली भाषा साहित्यक ज्ञान हस्तान्तरण कर’मे असफल रहलौं से दोष लैत ओ आन सबके अपन भाषाप्रति जागक’ चाही कहलनि।
मैथिली साहित्यक विकासमे रचनाकारक सराहना करैत पोथीमे संग्रहित कहवी, बुझौवल, फकड़ा, डाक वचन आदि वर्णानुक्रमअनुसार अर्थ युक्त बनेवापर ओ जोर देलनि। डा. यादव सप्तरी जिल्ला मैथिली भाषा साहित्यके गढ होइतहु अपेक्षित संरक्षण एवम् प्रवर्द्धनक अभावपर चिन्ता व्यक्त केलनि।
लुम्बिनी विश्व विद्यालयक पूर्व रजिस्ट्रार एवं इतिहासविद् डा. पिताम्बर लाल यादव मिथिला भाषा साहित्यके प्राचीनता एवम् इतिहास उल्लेख केलनि आ कहलनि जे ‘मैथिली’ भाषागत सम्पूर्ण अंग एवम् विधासँ परिपूर्ण होइतहु लोप हेवाके स्थितिमे अछि। ग्रामीण क्षेत्रमे प्रचलित मैथिली भाषाक कहबी, फकड़ा, लोकोक्तिक सङ्कलन प्रशंसनीय कार्य हेबाक ओ बतौलनि।
इन्टेलेक्चुअल फाउन्डेसन नेपालक अध्यक्ष डा. सूर्य प्रसाद यादव मैथिली बोलीके विविधताकेँ आन भाषाक संज्ञा नै देल जेवाक बतौलनि। विद्यालय मातृभाषा शिक्षामे देखलगेल असफलता, साहित्यकर्मीसबक चरित्र आदि विभिन्न विषयमे ओ टिप्पणी केलनि।
वरिष्ठ पत्रकार अधिवक्ता राम नारायण देव मिथिला भाषा साहित्यमे कहवी, बुझौवल फकड़ा डाक-वचन आदिके बारेमे चर्चा केलनि। मिथिला मिहिर पुरान मैथिली साप्ताहिकक चर्चा करैत ओ हेराइत गेल मैथिली शब्दक संरक्षण ओहि समयसँ होइत आयल बतौलनि।
मैथिली साहित्य परिषद्क पूर्व अध्यक्ष देवेन्द्र मिश्र मैथिली भाषा, साहित्य एवम् संस्कृतिक संरक्षणमे सम्पूर्ण मैथिलीभाषीकेँ एकजुट हेबाक बतौलनि। मैथिली मातृभाषा रहितो राष्ट्रिय जनगणनामे दोसर भाषाके मातृभाषा लिखेनाइ उचित नै कहैत ओ कहलनि- जे बजैछी सेहे मैथिली छी।
पत्रकार स्वतन्त्रता सेनानी वैद्यनाथ झा सगरमाथा साहित्य परिषद्के समयसँ सागरजीके साहित्यिक सक्रियता रहल जानकारी देलनि। ताहिकाल सागरजी कहवी, बुझौवल छोट-छोट फोटोकपी क’ ५/५ टकामे बाँटैत फिरैत छलाह।
नेपाल पत्रकार महासंघ सप्तरी अध्यक्ष श्रवण जन्मदिनके शुभकामना मैथिली भाषामा देवाक बतौलनि। पत्रकार सुधा देव, साहित्यकार सन्त कोठिपाल (सन्तोष कुमार चौधरी), साहित्यकार पिंकी कुमारी झा, मैथिली अभियानी श्यामप्रकाश यादव, मोडेल करण शर्मा, पूर्व सैनिक कैलाश कुमार यादव मैथिली भाषा, साहित्य एवम् संस्कृति संरक्षणमे अग्रसरता देखावयपर जोर देलनि।
विमोचन समारोहको अध्यक्षता करैत मैथिली लोकोक्ति सागर पुस्तकक ई संस्करणक प्रकाशक मधेश आम सञ्चार प्राधिकरणक पूर्व अध्यक्ष श्याम सुन्दर यादव पुस्तकके संकलक/लेखक/सम्पादक सागर वीर कडारी डेढ दशकसँ लोकोक्तिक संकलन आ प्रकाशनमे संलग्न रहिआयल बतौलनि। सागरजीक मूल नाम वीर बहादुर कडारी छन्हि। नेपाली मातृभाषी छथि, मुदा ई सदिखन मैथिलीक धरातलसँ जुडल रहलथि, हुनको कथन छलनि। पुस्तक बिक्रीसँ प्राप्त आय ‘अमृत सहारा फाउन्डेसन (गैरलाभकारी संस्था)’के सहयोग देल जेवाक जानकारी दैत ओ ई समाजसेवी संस्था सागरजीक अग्रज विशेष क्षमताक व्यक्तित्व अमृत बहादुर कडारीके नामसँ स्थापित छै, जे कोरोना कालसँ मानवताके सेवाले समर्पित अछि।
रचनाकार सागर वीर कडारी समारोहके स्वागत करैत मैथिली भाषा साहित्यकप्रति अपन आत्मिक रुची भावपूर्ण रूपमे प्रकट केलनि। गामघरके लोकवेदसँग उठबैठबाला स्वभावके कारण सागरजी जनबोलीके नजदीक पहुँच लोकोक्तिदिस आकर्षित भेलासन्ता ओ अहि अभियानमे लागल छथि। कोरोनाकालमे अप्पन भन्साके सबटा ६ बोरा चाउर आ नून-तेलसब बाँटिक’ किछ परिवारकेँ भूखसे जान बचेबाक स्मृति राखैतकाल ओ अत्यन्त भावुक छलथि। ओ तहिए असहायके सहायतालेल कटिबद्ध भगेला, जकर वर्तमान स्वरूप अत्यन्त उज्वल प्रतीत होइत अछि।
समीक्षा सार
मैथिली लोकोक्ति सागर पुस्तकके प्रथम प्रकाशन वि.सं. २०६९ अगहनमे भेलछल। २०७० भादबमे एकर पहिल संस्करण आएल आ अखन २०८२ भादबमे दोसर संस्करण प्रकाशित भ’ वितरित अवस्थामे अछि। आवरण चित्र रंजित झा ‘कौशल’के छन्हि। मिथिलाक प्राकृतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रतिनिधिके प्रतीकात्मक रूपमे चित्रित कैलगेल अछि। ८० पृष्ठके ई पुस्तक मैथिली लोकोक्तिक संग्रह मात्र थिक। कहवीक अर्थक अभावके कारण पाठकके किछ असहज भ’सकैत छन्हि। पुस्तकसँ किछ मुद्रण त्रुटि हटेबाक आवश्यक छै। मुदा सबसे पैग बात एहन दूर्लभ संकलन आ प्रकाशनक कटिबद्धताक छै।
पाठकसबके ई पुस्तक पढक चाही आ अभिभावक सबके चाही जे ओ ई पुस्तक अपन धियापुताके दथुन्, ताकि मैथिलीक जैर फेरसँ मजबुत कैल जा’सकए। पुस्तकके मूल्य १५०/- टका छै। लेकिन खुसखबरी इहो छै जे प्रत्येक पुस्तकके खरिदपर एकटा लौटरी टिकट फ्रि छै, जे न्यूनतम १००/- सँ लके १५,०००/- तकके १०४ गोटेके पुरस्कार राखल छै।





