सिरी संपादक जी,
पैरनाम।
आराम कुशल छी ने, अपने ? रजनीतिमे बेसी कुँदफान नहि करु । मुँहमारु भोटभाटके । एकर अलगे विद्या छै, अलगे केमेस्टरी होइ छै । अलगे समाजशास्त्र होइ छै । लोक बरिआति चलि जाइत, कठिआरि चलि जाइत मगर भोट नहि देत ।
जतेक पैसाकौरी मंगवे द देत, खुआपिआव आ मानसम्मानमे कोनो कमी नँई राखत मगर भोट नहि देत । माने सभठाम स्पेश देत मुदा नेतृत्वक लेल दावेदारी कएलापर मुँकरि जाइत । साहए ने भोट देबयमे नँई केओ देखैय हई, गुप्तदान होई हैय ।
नँई कोनो समय लगैय हई आ ने कोनो खरचा पानि लगैय हई तइयो लोक भोट कथिला नँई दैय है से नहि जानि । मगर एकबेर ईहो सोचव जरुरीए जे लोक अहाँके भोट कथिला देत, लोकके हुथकारय, हुरयपेटय आ धुरखूँरु नोचयसँ पहिने अपनेहिसँ अपने ई बात पुछला पर केहन रहत, आ की नहि संपादक जी?
अपनेक खुरलुच्ची समदियालवरसटकानन्द
जनकचौक, जनकपुरधाम
प्रस्तुत व्यंग्यात्मक सामग्री स्थापित पत्रकार एवम् साहित्यकार नित्यानन्द मण्डलद्वारा लिखल गेल अइछ । सं.





