राेशन जनकपुरी
समय लेहुलेहुआन अइछ। सहिष्णुता, दया, करुणा, सहानुभूति, अहिंसा, मानवीयता के दावा करैबला धर्म, हत्या, हिंसा, क्रूरता, अमानवीयता, असम्वेदनशीलता, मानव मानव बीच भेदभावके सब स निर्मम हथियार बइन गेल अइछ।
शासन आ धर्म, बजार अथवा पूँजीवादके चाकर भ’ गेल अइछ । ई तीनू अपन स्वार्थ पूरा कर’ के लेल समाजके एकटा भीड़मे परिणत क’ देने अइछ । भीड़, जतह सब असगर अइछ, खाली अप्पन हित रक्षामे अपस्याँत ! मानवीयता बचाब’ के लेल बजार, शासन आ धर्म आ जातिक विरुद्ध सामूहिकता आ सामाजिकता बचयनाई जरूरी अइछ, लेकिन एकटा उन्माद अइछ, जे हमरा अपनाके अपने विरुद्ध ठाढ़ क’ देने अइछ।
हमसब फासीवादी युगमे छी ।
हम सब एकटा घबाह आ निरीह समयमे छी । हमरा चेतना आ आशावादके एहन नुस्खाके जरुरी अइछ, जे हमरा मानवीय समाजमे बदैल दिअय ।
हिन्दी उर्दू के प्रसिद्ध गीतकार हसरत जयपुरी के ई आह्वान गीत एहने जीवन आ संघर्षशील आशाके गीत अइछ _
“चले चलो दिलोँ मे घाव ले के भी चले चलो”
चले चलो…
चले चलो दिलों में घाव ले के भी चले चलो
चलो लहुलूहान पांव ले के भी चले चलो
चलो कि आज साथ साथ चलने की ज़रूरतें
चलो कि ख़त्म हों न जाएँ ज़िंदगी की हसरतें
चले चलो …..
ज़मीन ख़्वाब ज़िंदगी यक़ीन सबको बांटकर
वो चाहते हैं बेबसी में आदमी झुकाये सर
वो चाहते हैं जिंदगी हो रोशनी से बेख़बर
वो एक एक करके अब जला रहें हैं हर शहर
जले हुए घरों के ख्वाब लेके भी चले चलो
चलो लहूलुहान पांव…….
वो चाहते हैं बांटना दिलों के सारे वलवले
वो चाहते हैं बांटना ये ज़िंदगी के काफिले
वो चाहते हैं ख़त्म हो उम्मीद के ये सिलसिले
वो चाहते हैं गिर सकें ना लूट के ये सब किले
सवाल ही हैं अब जवाब लेके भी चले चलो
चलो लहूलुहान पांव……….
वो चाहते हैं जातियों की बोलियों की फूट हो
वो चाहते हैं धर्म को तबाहियों की छूट हो
वो चाहते हैं जिंदगी में हो फरेब झूठ हो
वो चाहते हैं जिस तरह भी हो मगर ये लूट हो
सिरों पे जो बची है छांव लेके भी चले चलो
चलो लहूलुहान पांव……….
चले चलो दिलों में घाव ले के भी चले चलो
चलो लहुलूहान पांव ले के भी चले चलो
चलो कि आज साथ साथ चलने की ज़रूरतें
चलो कि ख़त्म हों न जाएँ ज़िंदगी की हसरतें
चले चलो …..
चले चलो… चले चलो… चले चलो…
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