रोशन जनकपुरी
(१)
राजनीतिक आकाशमे उगल
असमयके चुनावी चंद्रमाक प्रकाशमे
भुखल पेटमे
आशाके अंकुर अँकुरायल अइछ फेर
निर्भाव नयनसभमे
मोहक सपनाक भाव
सरसरायल अइछ फेर,
मुदा की कयल जाय
निष्ठुर इतिहासके,
जाहिमे अंकित अइछ
वचन, आश्वासन आ विश्वासक
प्रत्येक एकदिनहा चुनावी खेतीक बाद
पंचबरखा अकाल अबैत अइछ ।
-२-
फेर उधार माँगल बघनखा
नमैर रहल अइछ
फेर रक्तपिपासु दाँत
चमैक रहल अइछ
फेर क्रूर आ धूर्त नील गिद्दरसब
गाम पैसबाक तैयारीमे अइछ
फेर डाइढ़-डाइढ़ पर
गिद्ध डेरा खसा रहल अइछ
समाध चारुदिस फैल रहल अइछ —
एत्तहु आत्महत्त्याके चरण प्रारम्भ होयबला अइछ —
आशा सभक
वचन सभक
आ विश्वास सभक,
आ शुरू होयवाला अइछ मौसम
म’र बनबाक ।
हरेक मोर्चा कसकसायल अइछ
अपन-अपन पंचबरखा
महाभोजक योजना सहित ।
(‘समयगीत’ कविता संग्रह स)
# चित्र ‘मैथिली विकास कोष, जनकपुर’के कला दीर्घा स संकलित।





