संपादकजी, बातके कोना बँतङ्गर कोना बनाओल जाए ?


नित्यानन्द मण्डल

सिरी संपादकजी,
पैरनाम ।
हमरा बातसँ अपनेके हार्दिक तकलिफ नहि हुअए त, एकटा बात कहुँ । बात सुनबाक मुड अछि त, हम कहैत छी– एकटा बात जे बातके आँतर कोना बान्हल जा सकैए । बातके कोना लप्प द लोकल जा सकैए । बातके कोना भरिआओल जा सकैए । बातके कोना छकरल जा सकैए । बातके कोना कचरल जा सकैए । बातके कोना काटल जा सकैए । बातके कोना बहटारल जा सकैए । बातके कोना गरैय माछ जँका कहुँ छहैल नहि जाए त गप्प द घेँउटे, ठोँठे कोना पकरल जा सकैए । बातके कोना जिलेबी जेकाँ नमराओल जा सकैए । बातके कोना पिआउज जेकाँ छिलल जा सकैए । बातके कोना चिबाओल जा सकैए । बातके कोना हौँकल जा सकैए । बातके कोना बँतङ्गर कोना बनाओल जा सकैए । आखिर बातेसँ ने बात निकलतै । विना बातके त किछु नहि हएतैक । साहए त कहल बात दुर तलक तक जाएगी…ई सभ कलाके परेखबाक लेल हम उताहुल छी, सीखबाक लेल व्यग्र छी । ककरो चिक्कनचुनमुन, निम्मन आ मरखाह बातमे हमरा नहि परबाक अछि । तैं चलि चलैत छी, एहि ठण्डी, झाँपतोपमे कोनो चाह अड्डा पर ओतए बातक फुलछडि छोडैत छी ।
अपनेक बतबनौना
लबरसटकानन्द

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