संस्कृति मिश्र
खोट समय, नहि उघि सकैछ
सम्बन्धक रद्दीकेँ
नहि भ’ सकैछ चेहरा पर चेहरा
जँ दुनियाँ रखने अछि
चेहरा पर चेहरा
तँ हम की करी?
हम, हम छी
नहि भ’ सकैत छी अपनेसँ
अपनासँ अलग
लोहाके काटू, निकलैत अछि लोहा
पानिकेँ छाँटू, निकलैत अछि पानि
मुदा मुनक्ख जे देखाइत अछि बाहरसँ
से भीतरसँ निकलैत अछि किछु आओर !
की करी, हमहुँ लोहे-पानि छी
नहि भ’ सकैत छी ओहेन मनुक्ख
जे बाहरसँ किछु आओर
आ भीतरसँ किछु आओर
संगहि हमर कोनो
आकांक्षा सेहो नहि अछि
आजुक दुनियाँक
ओहन मनुक्ख बनवाक
जे राखने अछि चेहरापर चेहरा।
संस्कृति मिश्र
#मैथिली_कविता
#काछुक_पीठ_पर_धएल_दीप





