अजय कुमार साह/रासस
धनुषा, १४ फागुनः वसन्त ऋतुके आगमनसङे मिथिलाक गामगाममे गुञ्जैबला होरीके सुमधुर धुन एखन बिलाइत गेल छै । श्रीपञ्चमीसँ फागु पूर्णिमाधैर घरअङ्गना, चौक आ गल्लीगुचीमे जोगिरा गाबैबला युवापुस्ता विदेश पलायन भेलासँ परम्परा लोप होबाक चिन्ता अइछ ।
“कौन तालपर ढोलक बाजे, कौन ताल मृदङ्ग… जोगीरा सररर…!”
एहन प्रेम, हास्य आ सद्भावसँ भरल गीत पहिने मिथिलाके होरीकेँ जीवन्त बनाबैत छल । होलीक अवसरमे गाबैबला ई विशेष गीतकेँ ‘जोगिरा’ कहल जाइत छै ।
संस्कृतिविद् किशोरी साहके अनुसार जोगिरा होरी खेलाएबलासभहक बीच स्नेह, सद्भाव आ उत्साह प्रवाह करैत अइछ । ओ कहलैन, “होरी आ सङ्गीत बीच गहिर सम्बन्ध छै । सङ्गीत बिना होरीके कल्पनौ नै भ सकैत छै । होरी मोनक कुण्ठित भावनाकेँ सेहो शुद्ध करबाक विश्वास रहल अइछ ।”
मिथिला नगरपालिका–२ नक्टाझिजके ७२ वर्षीय रामपृत महतो विगतके याद करैत कहलैन, “पहिने वसन्त पञ्चमीसँ फागु पूर्णिमाधैर गामगाममे घुइम क जोगिरा गाबैत छलौँ। अखन ढोल, मृदङ्ग किछ नै बाजै छै, फागुके गीत सेहो नै सुनाइ छै ।” हुनक कहब अनुसार जोगिरा गाबैबला पुस्ता क्रमशः कम होइत गेलासँ ई परम्परा सङ्कटमे पड़ल अइछ ।
विदेश पलायन होएब, संस्कति हस्तान्तरण नै होएब इएह कारणसभसँ मौलिक परम्परा लोप होबाक जोखिम बढ़ल बतौलैन । “अइबेरके होरी लगचिया गेल, मुदा नै जोगिराके स्वर सुनाइ छै, नै तँ बाजाके ताल”, ओ कहलैन, “पुरना परम्पराके जानकार बहुत सङबेसभ मइर गेलाह, हमरोसभ उमेरगर भेलियै । गाबैके लौलसा अखनो छै, मुदा साथ के देत ? युवासभ छेबे नै कएलै।”
हरिहरपुरके ७० वर्षीय रामसुन्दर महतो जोगिराके पुरान शैली स्मरण करैत सुनौलैन–
“किनकाके हाथ कनक पिचकारी,
किनकाके हाथ अबीर झोरी ?
रामजीके हाथ कनक पिचकारी,
सियाजीके हाथ अबीर झोरी… जोगिरा सररर…!”
एहन पौराणिक प्रसङ्ग, भक्ति, प्रेम आ हसिमजाकसँ भरल मैथिली जोगिरा आब सायदे सुनल जा सकैत छै । पुरान होलियासभके अनुसार जोगिरा सामाजिक भेद्भाव मिटाबैत समानता आ सद्भावके समाद दैत छलै। मुदा अखन ‘डिजे’ संस्कृतिके प्रभाव बढलासँ मौलिकता हराबैत गेल नेपाल पत्रकार महासङ्घक केन्द्रीय सदस्य राजेश कर्ण बतौलैन ।
मिथिलामे वसन्त पञ्चमीसँ होरीक गीत मिथिला माध्यमिकी परिक्रमासँ जुड़ल सांस्कृतिक परम्पराके हिस्सा सेहो छी । धार्मिक मान्यताअनुसार फाल्गुण शुक्ल पूर्णिमाके राइतमे होलिका दहन क भोरमे रङ खेलबाक परम्परा अइछ । जोगिरा धार्मिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक एकताके सेतु जकाँ भूमिका रहल जानकारसभ कहैत छैथ ।
जनकपुरधाम–१२ क सतीशलाल कर्ण कहलैन, “पहिने होरीक गीतमे धार्मिकता, जीवनके उमङ्ग आ सांस्कृतिकता छलै। आब तँ उच्छृङ्खल गीतसभसँ भइर गेल छै ।”
हरिहरपुरके रामलाल महतोक अनुसार आपसी रागद्वेष आ सामाजिक विखण्डन सेहो जोगिरा परम्परा कमजोर बनाबैत अइछ । सखुवा बजारके सत्यनारायण सिंह स्मरण करैत कहलैन, “पहिने चौकमे राइतक जमा भ क झाइल, मृदङ्ग, ढोल आ डमरु बजाबैत समूहगत रूपमे जोगिरा गाबल जाइत छल । आब से नै देखाइत छै ।” वैदेशिक रोजगारीक कारण युवासभ चइल गेलासँ से ई कमी भेल अइछ ।
संस्कृतिविद् तथा वरिष्ठ पत्रकार रामभरोस कापडीक अनुसार ग्रामीण क्षेत्रक होरीक गीतमे स्थानीय माइटके सुगन्ध आ मौलिकता देखाइत छलै। “पश्चिमी प्रभाव आ अश्लीलता मौलिक जोगिराकेँ विस्थापित करैत गेल छै”, ओ कहलैन ।
साहित्यकार तथा संस्कृतिविद् डा राजेन्द्र विमल जोगिरा संरक्षणक लेल सामूहिक पहल आवश्यक रहल बतौलैन । “होरी एहन होए जत महिला, पुरुष निर्धक्क सहभागिता भ सकैए आ विश्वमे मिथिलाके उदाहरण प्रस्तुत होए”, ओ कहलैन ।
अइ बीच, जनकपुरधामस्थित मिथिला नाट्य कला परिषद् (मिनाप) किछु सालसँ निरन्तर जकाँ जोगिरा प्रतियोगिता आयोजन करैत अइ संरक्षण करबाक प्रयास क रहल अइछ । तइयो, परम्परागत जोगिराके मौलिकता बचाएब राज्य, स्थानीय तह आ समुदाय सबके सक्रिय जागरुकता आवश्यक रहल संस्कृतिप्रेमीसभके धारणा अइछ ।





