शासनक संघत


 

रोशन जनकपुरी

जेना बाबाजीके पंघत,
सब खा खा घसैक रहल ।
आदमी परेशानसन,
कोनो खण्डहर मकानसन
पल पल भसैक रहल ।
आसके पुछारी,
जेना अबलाके साड़ी,
ठाम ठाम मसैक रहल।
पसीनाक बाल,
वेहे ठन ठन गोपाल,
मलिकैयतक मुख दमैक रहल ।
बजारक भाव,
जेना गिद्धक पढ़ाई,
नोँइच नोँइच चसैक रहल।
लोकबेदक दर्द,
आ मसानी दर्द,
मन पोर पोर कसैक रहल ।
नव सत्यके गढ़ैन,
नव संघर्षके चरण,
पथ दूरतक चमैक रहल।
_ रोशन जनकपुरी
(‘समय गीत’ कविता संग्रह स)

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