रञ्जु मिश्रा
संगीत मात्र सुर, ताल आ ध्वनिक खेल नहि होइत छैक अपितु संगीतक मूल उद्देश्य मनुष्यक अन्तःकरणमे भावक संचार करब होइत छैक। साहित्य आ संगीत मे शरीर आ आत्माक संबंध होईत छैक। दुनूक सम्बन्ध एहन घनिष्ठ अछि जे एक के बिना दोसरक अस्तित्व अपूर्ण सन बुझना जाइत छैक । विशेषतः सुगम संगीत, लोकसंगीत, भक्तिगीत अथवा काव्य-गायनमे शब्दक महत्ता सर्वोपरि रहैत अछि। एहन गीतमे सुर आ ताल साधन थिक, साध्य नहि। साध्य थिक—गायिकीक द्वारा रचनाकारक अनुभूति, भाव आ रसक सम्प्रेषण सँ श्रोताक मोन मे उतरब।
कोनहु गीतक पद कविक निहित भावक निरूपक होइत अछि। ओहि मे कोनो ने कोनो रस प्राणरूपेँ जीवित रहैत अछि। कुशल तबलावादक अपन धा धी ना क बोल तक मे भाव निकालि लैत छथि, नर्तक मुद्रा आ भंगिमासँ ओहि भावकेँ मूर्त रूप दैत छथि, आ एक मर्मज्ञ गायक स्वरक माध्यमसँ ओहि पदमे प्राण फूँकि दैत छथि। पद केवल शब्दक समूह नहि, अपितु कविक अन्तःकरणक अनुभूतिक प्रतिध्वनि होइत छैक।
शास्त्रीय संगीतक अपन स्वतंत्र सत्ता अछि। ओतय राग, स्वर, ताल, आरोह-अवरोह आ लयक कठोर अनुशासन होइत छैक । एकहि पद अनेक रागमे गाओल जा सकैत अछि। मुदा प्रश्न उठैत अछि—की करुण भावसँ ओतप्रोत पदकेँ वीर रसक प्रवृत्तिमे गाओल जाए तँ ओ श्रोताक मन-प्राणमे ओहने प्रभाव उत्पन्न कऽ सकत? सम्भवतः नहि। कारण ई केवल संगीतक प्रश्न नहि, अपितु रचनाकारक भाव-संसारक संग अन्यायक थिक।
भारतीय काव्यशास्त्रमे रसक सिद्धान्त अदौ सं स्थापित अछि। वीर रस उत्साह, ऊर्जा आ पराक्रम केँ उसकबैत अछि। करुण रस हृदयकेँ द्रवित करैत अछि। शृंगार रस आकर्षण आ अनुराग उत्पन्न करैत अछि। भक्ति रस समर्पण आ श्रद्धाक भाव जगबैत अछि। प्रत्येक रसक अपन मनोवैज्ञानिक प्रभाव अछि। तें गायन शैली सेहो रसक अनुरूप हेबाक चाही।
कविता अथवा गीतक शब्द-संयोजनमे रचनाकारक कोनो ने कोनो स्थायी भाव अवश्य विद्यमान रहैत अछि। जखन ओ पद संगीतकारक हाथमे पहुँचैत अछि तँ योग्य संगीतकारक प्रयास रहैत अछि जे स्वरक माध्यमसँ ओही भावकेँ जीवंत करथि, जाहिसँ रचनाक प्राणतत्त्व अक्षुण्ण रहय। संगीतकार केवल धुन संग स्वरलिपि नहि बनबैत छथि, ओ भाव केँ जीवंत करैक चेष्टा करैत छथि। छथि।
भक्तिकालीन रचना सब मे अनेक ठाम पदक संग रागक नामोल्लेख सेहो भेटैत अछि। एकर उद्येश्यमात्र पदानुरुप भावक पसार छल। राग मात्र सुर-श्रुतिक संयोजन नहि, बल्कि भावक वाहक सेहो होइत अछि। एहि कारण सँ परम्परामे समय, ऋतु, अवसर आ भावक अनुरूप रागक विधान विकसित भेल।
जँ विद्यापतिक पदावलीक उदाहरण ली तँ एकर सत्यता आरो स्पष्ट भऽ जाइत अछि। पारम्परिक गायनमे पदानुरूप एक अव्यक्त रसधार सहज अनुभव कएल जा सकैत अछि। विद्यापतिक पद जखन गौल जाइत छैक तँ ओहि पदक एहन प्रभावछैक जे वैह सुर लगैत छैक जेहन ओकर भावछैक ।कतहु जं विद्यापति सुनू तं ओहि मे विद्यापति उपस्थित बूझेताह! आब यदि हुनकर पद कें अहां कुमार गंधर्वक शैली मे झटहा मारबैन तँ ओ ओहि मे सँ भागिये टा जेताह। श्रोता सुरेक कलाकारी सँ नहिं प्रभावित होइत छथि , बल्कि ओहि स्वरक भीतर कविक आत्माक स्पर्श अनुभव करैत छथि।
सैद्धान्तिक रूपसँ कोनो पदकेँ कोनो रागमे गाओल जा सकैत अछि, मुदा व्यवहारमे ई सदिखन उचित नहि होइत अछि। दास्यभक्तिक पदकेँ झूमड़क भास , विरहकेँ चंचल शृंगारमे अथवा सभ प्रकारक गीतकेँ एके ढाँचामे ढालि देब संगीतक विविधता आ रसपरम्पराक अवमूल्यन थिक। एके प्रकारक गायनशैलीमे सभ भावकेँ बाँधि देब संगीत धर्मक विपरीत काज भेल।
दुर्भाग्यवश वर्तमान समयमे मिथिलाक भास गायन मे प्रयोगधर्मिताक नाम पर एहन प्रवृत्ति बढ़ि रहल अछि जाहिमे मौलिक भावक अपेक्षा नवीनता आ आकर्षण पर अधिक बल देल जाइत अछि। निश्चित रूपेँ कला जड़ नहि रहि सकैत अछि। नव प्रयोग आवश्यक अछि। मुदा मूल जे छलैक ओ तं अपन पहिचिन सं मरि जेतैक।प्रयोग ओतबे धरि ग्राह्य अछि जतय धरि ओ रचनाक मूल संवेदनाकेँ अक्षुण्ण रखैत अछि। जँ प्रयोगक परिणामस्वरूप रचनाक आत्मा बदलि जाए तँ ओ नव सृजन भऽ सकैत अछि, मूल रचनाक प्रस्तुति नहि।
एखन लोकप्रिय संगीतमे एकटा प्रवृत्ति देखल जा रहल अछि जे हर भावकेँ एकहि प्रकारक स्वर-विन्यासमे ढालि देबाक प्रयास होइत अछि। कखनो सूफियाना शैली फैशन बनि जाइत अछि, कखनो अत्यधिक नासिक्य स्वर, कखनो एहन कृत्रिम कंपन जेना गायक कोनो मादक प्रभावमे होथि। परिणाम ई होइत अछि जे गीतक शब्द पृष्ठभूमिमे चलि जाइत अछि आ गायकी स्वयं केन्द्र बनि जाइत अछि। श्रोता गीतक भाव नहि, बल्कि गायनक शैली सुनैत छथि।
एहि प्रवृत्तिक प्रभाव लोकसंगीत धरि पहुँचि गेल अछि। समदाउनक भाषमे उपनयनक गीत, उपनयनक धुनमे विवाहगीत, विवाहगीतक स्वरमे भक्ति—सभटा एक-दोसरामे घुलमिल रहल अछि। जखन की भास सं बाट बटोही तक बुझि जैत छलैक जे एहि आंगन मे की भ रहल छैक।टोलबैया गीतक भास स बूझि जाइत छलैक जे कन्यांदान भ गेलै कि वेदी तरसिंदुरदान भ रहल छे।भीखक बेर छै कि चुमौनक।ई ताकत छलैक एहि सिस्टमेटिक भास गायनक।किनको नाम लेब तँ बात खराब भ जाएत ,मुदा देखैत तं छीयै ।किछु प्रमाण मे राखियो लैत छी।उदासी के सोहर कहि सेहो गबैत सुनलहुं। लोकपरम्परामे एक फकड़ा प्रचलित अछि—”साँझ पराती, भोर बसन्त।” एहि छोट वाक्यमे संगीतक सम्पूर्ण दर्शन निहित अछि। परम्परा जानैत छल जे प्रत्येक समय, प्रत्येक अवसर आ प्रत्येक भावक अपन स्वर होइत अछि।
आधुनिक वैज्ञानिक शोध सेहो स्वीकार करैत अछि जे संगीत मानसिक आ शारीरिक स्वास्थ्य पर गहन प्रभाव छोड़ैत अछि। सम्भवतः एहि कारणेँ परम्परामे विभिन्न समय, ऋतु आ भावक लेल विशिष्ट राग, धुन आ गायनशैली निर्धारित कएल गेल छल। ई केवल रूढ़ि नहि, बल्कि दीर्घ अनुभवसँ उपजल सांस्कृतिक ज्ञान छल।
किन्तु वर्तमान समय ‘व्यूज’, ‘ट्रेण्ड’ आ ‘लोकप्रियता’क समय थिक। आब कलाकारक मूल्यांकन प्रायः भाव-सिद्धिसँ नहि, बल्कि दृश्यता आ प्रसिद्धिसँ होइत अछि। सोशल मीडिया स्टार बनब सहज भऽ गेल अछि, मुदा भावक सच्चाईक माप करब कठिन। फलतः कलाकारक व्यक्तिगत रुचि आ बाजारक माँग अनेक बेर रचनाक मूल भाव पर भारी पड़ि जाइत अछि।
निश्चये कलाकारकेँ अपन शैली चुनबाक अधिकार अछि। प्रयोगक सेहो स्थान अछि। मुदा जखन साहित्यक पद संगीतक आश्रय ग्रहण करैत अछि तँ गायकक उत्तरदायित्व केवल स्वर प्रस्तुत करब नहि, बल्कि कविक भावलोककेँ श्रोताक हृदय धरि पहुँचाएब सेहो होइत अछि। जँ भाव, शब्द आ स्वर एक-दोसरक संग चलैत अछि तँ संगीत साधना बनैत अछि; आ जँ भावक उपेक्षा कऽ केवल शैली प्रधान भऽ जाइत अछि तँ संगीत अपन आत्मासँ दूर भऽ जाइत अछि।
साहित्य आ संगीतक सम्बन्ध अनन्योनाश्रित अछि। साहित्य संगीतकेँ अर्थ दैत अछि आ संगीत साहित्यकेँ प्राण। तें आवश्यक अछि जे नवीनताक खोज अवश्य हो, मुदा रस, भाव आ पदक आत्माकेँ विस्मृत नहि कएल जाए। कारण अन्ततः श्रोता ओही प्रस्तुति केँ स्मरण रखैत छथि जाहिमे कविक भाव, आ गायक पदानुरुप सुर मिलि धार जकां बहैत अछि । यैह संगीतक सौन्दर्य होइत छैक आ यैह ओकर धर्म सेहो ।





