सन्त कोठिपाल
“गृहस्थी-पीडित लोक क्रोधवश अपन पीडा फेसबुकसँ दूर-दूरतक फैलादैत अछि। मुदा एहिमे अपनो न्यूनता देखाइत अछि। कदाचित पीडासँ मुक्ति भेट जाय, परञ्च एकर शूल पाछातक दुनूदिस टीस मारैत रहैछै।”
मनुष्यक जीवनचरित
मनुष्य मायके गर्भसँ नाल कटाक’ जन्म लेवबाला जरायुज प्राणीमे गनल जाइत अछि। अपन विलक्षण मस्तिष्क आ बुद्धिबलक अधिकताक कारण मनुष्य स्वयंके श्रेष्ठ बुझैत अछि। मुदा लोकक प्रवृत्ति, कर्म, गति आ अगति/दुर्गति आदि देखलापर, प्रत्येक मनुष्यके श्रेष्ठ मनुष्य कहब उचित नहिं होयत।
मनुष्य, अन्य प्राणीक जीवनक अपेक्षा अपन जीवनके विषयमे अधिक शोध केलक अछि। मुदा एहन शोधसबहक अर्थ जेकिछु प्राप्त केलक, ताहि अर्थकप्रति स्वयं अबोध रहिगेलाक कारणें, ओहेन लोककेँ समान रूपमे सम्मानित जीवन प्राप्त नहि होयत छन्हि।
पता नहिं किएक! मनुष्य आन प्राणी जेना एकरुपिया किएक नहि रहिगेलत, बहुरुपिया किएक भ’गेल? मन (चित्तवृति)क संसारमे जीवयबाला भेलाकारणें मनुष्य नाम धरायल अछि। मनक तर्कनासँ उपर उठि अनुभवक बोध (बुद्धिवृत्ति)मे जीवयबाला जीवन सुखी आ आनन्ददायी होयत छैक। शिशु मनसँ नहि, बुद्धिसँ जीवैत अछि, तैं आनन्दित रहैत अछि। ज्ञान (जानकारी) के वृद्धि मन (तर्क)के विस्तार छैक; तर्कक आधार पर प्राप्त सार यदि विवेकपूर्ण रूपसँ अनुभूत होय, त ओ बुद्धि भेल। ज्ञानवान आ बुद्धिमान हेबामें अन्तर छैक। परञ्च सामान्यजन मनक संसारेमे अपन जीवन बितादैत अछि, ओहिसँ उपर उठि बुद्धिक जीवनमे प्रवेश बिनाकेने। मनक संसार कष्टप्रद आ बुद्धिक संसार आनन्ददायी होयत छैक।
जीवन ‘जन्म आ मृत्यु’ बीचके फासला छिएक। मनुष्यक वशमे ने ओकर जन्म छैक, आ ने ओकर मृत्यु। ओकर वशमे यदि किछु छैक, त ओ ‘जीवन’ छैक। जीवनके चरित कर्म छिएक। कर्म (वा अकर्म)रहित जीवन अर्थात् निष्प्राण जीवन। ब्रह्म छोडि आर किओ निष्कर्मं नहि भ’सकत। कर्मोके लेल कहल जाइत छैक जे कर्मपर मात्र अधिकार भ’सकैछ, परिणामपर नहि, किंतु अकर्मण्य देहि स्वीकार्य नहि- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (श्रीमद्भगवद्गीता २.४७)” गति, अगति/दुर्गति
कर्मक आधारपर जीवनक गति वा अगति वा दुर्गति निर्धारित होइत छैक। मनुष्यक श्रेष्ठताक आधार गतियुक्त अर्थात् गतिशील जीवन बनैत छैक। गतिरहित जीवन अगति वा दुर्गतिपूर्ण होइत छैक। स्थिर वा अचल जीवन अगति कहाइत छैक। अगति, अर्थात् दुर्दशापूर्ण जीवन। दुर्गति, अर्थात् मृत्यु आ सद्गतिमे दुर्दशा, मृत्योपरान्त कलंक आदि। जीवनके पूर्वार्धमे होबबाला दुर्दशाकेँ कारण पूर्वज (पूर्व जीवन)क कर्मक दोष मानल जाइत छैक, त उत्तरार्ध जीवनमे विद्यमान दुर्दशाकेँ अपनहि कर्मक दोष मानल जाइत छैक।
यदि मनुष्य चाहय त अपन कर्मक दोषसँ उत्पन्न भेल दुर्दशाकेँ सुधारिसकैत अछि। किछु सीमातक ओ अपन पूर्वार्धके दुर्दशाकेँ सेहो सुधार’लेल समर्थ भ’सकैत अछि। किंतु एहिलेल गति वा अगति/दुर्गति विषयक बोध हेनाइ जरुरी होइत छैक।
समाजमे आनन्द, सुख, दु:ख, दुर्दशा आदि सबदिनसँ छैक, जे मनुष्यके ओकर कर्मक प्रतिफलके रूपमे प्राप्त होइत छैक। जीवनमे ‘जेहन कर्म तेहन दशा’के प्राकृतिक नियम वा सूत्रके प्रति जागरुक हेनाई जरुरी छैक। एहेन प्रकारके चिन्तन आ बोध नहिं भेलासँ जीवन अनेक तरहसँ संकटग्रस्त आ दुर्दशापूर्ण हेबाक सम्भावना रहैत छैक।
समाजमे कोन व्यक्ति केहन कर्मक कारण आनन्दित वा सुखी छथि अथवा केहन कर्मक कारण दु:ख वा दुर्दशामे जीवरहल छथि, से नजर दौडेलापर देखल जा’सकैए। कतेक लोक अपन दु:ख वा दुर्दशाके लेल दोसरके दोष दैत परपंचैतीसँलके अड्डाअदालततक दौड लगबैत अछि, मुदा अपन त्रुटी वा पूर्वकर्मकेँ निहारबाक चेष्टा नहिं करैत अछि। आइकाल्हि, दुखी, पीडित लोकसब क्रोधवश अपन दु:ख वा पीडा इन्टरनेटके सुविधाक कारण दूर-दूरके लोकतक पहुँचादैत अछि। मुदा एहिप्रकारें अपन आ गृहस्थीक दूरावस्थाक प्रचार करैतकाल अपन त्रुटि, कमी, न्यूनता वा अज्ञानताकेँ नहिं देखैत अछि। कदाचित एहि कारणें दुर्दशासँ मुक्ति किएक नहिं भेट जाओ, मुदा पारिवारिक जीवनमे एकर शूल शेष अवश्य रहिजाइत छैक, जे पाछाँ सदिखन दुओदिस टीस मारैत रहैत छैक।
लोक बड प्रेमसँ सन्तान जन्माबैत अछि, पालन-पोषण करैत अछि, अपन सामर्थ्यतकके सुख-सुविधा जुडादैत अछि, डाक्टर-इन्जिनयर पढाबैमे अपन सबकिछु लुटादैत अछि। निक-निक वर-कन्या-वर धूमधामसँ विआह रचादैत अछि। तब ओ स्वयंकेँ पोतापोती/नातिनातिनक लालनपालन समर्पित क’दैत अछि। मुदा बौआबुचीके खेलाबयतक घरमे सबकिओ खुस रहैत अछि। तकरबाद बुढबा-बुढिया बेटापुतोहुके नजरिमे गड’ लगैत अछि। बात-बातमे प्रौढताक उपयोगितापर उठैत प्रश्न बुढबो-बुढियाके बदैल दैत अछि। जकर परिणाम होइत छैक- कलह आ कलहक कारण किनको ने किनको दुर्दशा। “बलगरक घर, दूर्बलक चौपाइड”। कत्तो साउस, कत्तो ससुर, कत्तो बेटा कत्तो पुतोहकेँ दरदरके ठोकर खाइत देखल जा’सकैए।
नियतिक बोध
देवी उपासनाक महान ग्रन्थ दुर्गा सप्तशतीक तेरह अध्यायी कथा सुरथ नामक राजा आ समाधि नामक वैश्यक व्यथाक प्रसंगसँ प्रारम्भ होइत अछि, जे सम्पूर्ण कथाक ध्येयके रूपमे ग्रन्थमे समाहित कएल गेल अछि। प्रसंगानुसार, राजा वा वैश्य अपन समयमे राजपाट-सरसम्पत्ति निके अरजलैथ आ भोगलैथ। मुदा प्रौढ अवस्थामे पहुँचलापर राजपाट, खरखजाना, सरसिपाही, वरव्यवसाय, नौकरचाकर आदि सम्पूर्ण सामर्थ्यपर बेटासब कब्जा करैत हिनकासबके बेदखल क’देलकनि। राजा वा वैश्य अपन सर्वोच्चता पुनर्स्थापित कर’लेल अपनाभैर लडलाह, मुदा असमर्थ भ’ जानेपर पडिगेलापर जंगलदिस पडेलाह। भितर जंगलमे राजा आ वैश्यक भेंट होइत छन्हि। परस्पर परिचयक बाद दुनुगोटे एक दोसरक कथा-व्यथा सुनैत-बुझैत सान्त्वना आदानप्रदान करैत छथि। मुदा, जंगल त भागिअयलहुँ, लेकिन आगाँक उपाय की? समान सबाल शेष रहिगेलनि। निकट मेधा ऋषिक आश्रम हेबाकारणें ओसब हुनक शरणमे पहुँचलाह, जतए ओ लोकनिके नियतिक ज्ञान होइत कल्याणक मार्ग प्रशस्त होइत छन्हि।
वर्णाश्रम व्यवस्था
जीवनमे, मनुष्य अपन कर्मक आधारपर डेगेडेग आगाँ बढैत छैक। मनुष्यके कोनहु कर्म कर’लेल ओकर प्रेरणाक स्रोत ओकर मन वा ओहि मनसँ उपर रहल ओकर बुद्धिसँ ओकरा प्राप्त होइत रहैछै। शरीरमे मन एक तेहन अवयव छिएक, जे चञ्चल होइत छैक, आ जकर वृत्ति, सुख-दु:ख, स्नेह-घृणा, काम-निष्काम, अपन-आन, निक-खराब, चमक-दमक, लाभ-हानी, लोभ-मोह, आग्रह-पूर्वाग्रह, जाल-झेल, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म आदि अनेक रंगबिरंगी गुण आ भावमे तरंगित रहैत छैक। कोनो निर्णय कर’मे कखन कोन सफ्टवेयर (गुण-भाव) अपन रूप देखादेतैक, से हरदम केकरो वशमे नहिं रहिसकैए। लेकिन बुद्धि तेहन प्रकारके सम्पूर्ण गुण आ भावसँ उपर छैक, जे मनुष्यकेँ विवेक आ प्रज्ञाके रूपमे प्राप्त छैक। प्रज्ञाक अवस्थामे त किओ-किओ जाइत छथि मुदा विवेककेँ सामान्यजन सेतो जगासकैए। परञ्च विवेककेँ जगेबालेल आवश्यकता होइत छैक, बोध अर्थात् बुद्धिसँ। लेकिन ऊहो बुद्धि कतएस प्राप्त होइत छैक से पुछलापर जवाब छै जे मनुष्यक जीवनपर आदि-अनादि कालसँ होइत आएल शोधसबसँ। मनुष्यक पूर्वज सेहो एहिप्रकारके दौरसबसँ गुजरलाह अछि। आर, ओसब अपन अनुभूत बुद्धि बताक’ गेलाह अछि। वर्तमानमे लोकके पूर्व आनुभविक बुद्धिके अनुसरण केलासँ ओकर जीवन दुर्दशासँ मुक्त भ’सकैए।
मनुष्य अपनाके बहुत किछु बुझैत अछि, मुदा जे बुझबके चाही से सबकिओ नहिं बुझैत छथि। मनुष्यके भैर जीवनमे मुख्य चारि चरणके शारीरिक आ मानसिक अवस्थाके पारकर’ पडैछै- नाबालिग, बालिग, प्रौढ आ वृद्ध। पुरे जीवनचरित इएह चारि प्रकृति आ प्रवृत्तिमे विभक्त छै। प्रत्येक चरणके विभक्ति आ निवारणके बुद्धि पर सेहो पूर्वजक योगदान छन्हि, जे वर्णाश्रम सिद्धान्त नामसँ प्रसिद्ध छै। लोकले बालिग अवस्था वर्णाश्रममे ब्रह्मचर्य आश्रम कहाइत छै। तहिना बालिग अवस्था- गृहस्थ आश्रम, प्रौढावस्था- वानप्रस्थ आश्रम आ वृद्धावस्था- सन्यास आश्रम कहाइत छै। नाबालिग, बालिग, प्रौढ वा वृद्धत्व समाजद्वारा शारीरिक आ मानसिक अवस्थाक दृष्टिसँ देलगेल नाम थिकै मुदा वर्णाश्रम सिद्धान्तद्वारा देलगेल ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास नामक ध्येय व्यक्तिकेँ जीवनके चारो चरणक चरितके परिभाषित केनाई थिकै।
राज्य, समाज वा अभिभावक नाबालिगके एक समर्थ नागरिक, व्यक्ति वा सन्तानके रूप देबलेल तत्पर होइत छै। मुदा ब्रह्मचर्य सिद्धान्त अनुसार देलगेल नामसबमे अनुशासनक माध्यमसँ चरित्रवान बनेबाक बात होइत छै। सामाजिक शिक्षा आ व्यवहारमे अनुशासन आ जीवनचरितके सन्दर्भक अभाव होइत छै।
खासकए वर्णाश्रमके तेसर चरण, जेकरा समाजमे ‘प्रौढ’ आ वर्णाश्रम सिद्धान्तमे ‘वानप्रस्थ’ कहल जाइछै, तहुमे अनुशासन आ चरित्रके ओतबहि प्रधानता छै। ‘वानप्रस्थ’ सिद्धान्त जीवनके प्रौढावस्थाक विहंगम सामाजिक समस्याक समाधानक अचूक उपाय थिकै। प्रौढावस्था गृहस्थीसे अवकासक प्रारम्भ थिकै।
वानप्रस्थ सिद्धान्त
वानप्रस्थक स्थूल अर्थ “वनगमनक मार्ग” होइछै। वनगमनक मार्ग कहलासे वनवासी नहिं, वनोन्मुख व्यक्ति बुझक चाही। सँगहि वानप्रस्थ एक सिद्धान्त छैक, जेकरा शाब्दिक अर्थमे संकुचित भ’ विवेचन नहिं क’सकैछी। वानप्रस्थक चरितके समग्रतामे बोध करक चाही। किएक त ई प्रत्येक मनुष्यके जीवनके सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चरण छिएक।
गृहस्थीमे रहितो, गृहस्थीसे शनै:शनै: दूर होइत जेनाई वानप्रस्थ सिद्धान्त थिक। वानप्रस्थीके लेल परिवारमे रहबसँ निषेध नहिं छैक, मुदा परिवारमे रहितो ई बोध होमए पडतन्हि जे गृहस्थी-विमर्शक जिम्मेवारी ओकर छैक, वर्तमानमे जे किओ ‘गृहस्थ आश्रम’क जीवन जीवरहल छैक।
वानप्रस्थ सिद्धान्त एक तेहन जीवनचर्या छिएक, जाहिमे गृहस्थीक जिम्मेवारी बालिग सन्तानके क्रमशः हस्तान्तरण करैत, स्वयंके मार्गदर्शकक भूमिकामे परिवर्तित कएल जाइछै। मार्गदर्शन सेहो हस्तक्षेपकामी नहिं होय। गृहस्थ जीवन आर्जन आ भोगमे बेसी केन्द्रित रहैछै त वानप्रस्थ जीवन साहचर्य आ उर्ध्वगमनमे बेसी केन्द्रित रहैछै।
वानप्रस्थ चरित पारिवारिक जिम्मेवारीक हस्तान्तरण आ स्वयंमे आध्यात्मिक प्रवर्तनक तेहन स्वरूप छै, जाहिमे व्यक्ति पारिवारिक दायित्व सन्तानके सोंपैत अपन ध्यान आत्म-चिंतन आ आत्म-साधुतापर केन्द्रित करैत अछि। वानप्रस्थ स्वाध्याय, योग, ध्यान, भक्ति आ जनसेवाक माध्यमसँ अपन जीवनकेँ उधोमुखी बनेबाक एक अवसर थिकै। वानप्रस्थ सन्यास आश्रमके एकपेडिया छिएक, जतए व्यक्ति वैराग्यदिस गतिशील रहैत समाजमे अपन ज्ञान आ अनुभवक प्रसार करैत अछि। व्यक्ति समाजमे विद्यमान वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक समस्यासब दूर कर’मे अपन योगदान करए, से वानप्रस्थ आश्रमके विशिष्ट उद्देश्य छैक।
गृहस्थ, गृहस्थी आ गृहस्थाश्रम
ब्रह्मचर्यके उपरान्त विवाह क’ वर्णाश्रमके दोसर आश्रममें रहयवाला व्यक्ति गृहस्थ कहाइत अछि। ओ गृहवासी, गृहपति, गृहस्वामी, ज्येठाश्रमी, घरबारवाला, बालबच्चेदार आदि नामसँ सेहो जानल जाइत अछि।गृहस्थीक अर्थ छैक घर, परिवार वा घरेलू जीवन। ई घर-बार, व्यवसाय, परिवारके पालन-पोषण आ घरक व्यवस्थाके चरितार्थ करैत छै। गृहस्थके पत्नी गृहस्थिन कहाइत छैक, घरक देखभाल आ व्यवस्थाक दायित्व सम्हारैबाली। गृहस्थाश्रम, वर्णाश्रममेसँ दोसर आश्रम, जाहिमे ब्रह्मचर्य अर्थात् विद्याध्ययन आदिके उपरान्त लोक विवाह क’ प्रवेश करैत अछि आ घरक कामकाज देखैत अछि। जीवनके ओ अवस्था जाहिमे लोक स्त्री, सन्तान कटुम्बक साथ रहैत ओकर पालन करैत अछि।
गृहस्थी कर्मक्षेत्र अछि, कारण एहिमे कर्म आ सुख दुनू केँ समेटल गेल अछि। सुख ओहि मन के शान्ति आ संतोष सँ भेटैत अछि, जे लोक अपन कर्म करैत प्राप्त करैत अछि। मुदा इएह गृहस्थी असमझदारीक कारण विघटनके सिकार सेहो भ’जाइत छैक।
परिवार कुटुम्बक समूह थिकै। समूूहके नेतृत्व देबाक कर्तव्य गृहस्थके होइत छैक। एहि गृहस्थक संरकक्षत्वमें परिवार गतिशील रहैत छैक, सुखी आ समृद्ध होइत छैक। मुदा गृहस्थीक नेतृत्व कोनो कुटुम्बद्वारा अतिक्रमित होमय लागलापर परिवारमे कलह उत्पन्न होइत छैक। पारिवारिक कलह प्राय: पतिक नेतृत्वपर पत्नीक हस्तक्षेप आ गृहस्थ पुत्रक नेतृत्वपर प्रौढ पिताक हस्तक्षेपक उत्पन्न होइत छैक। वानप्रस्थ आश्रम इएह गृहस्थ पुत्र आ प्रौढ पिताक कर्तव्यक विवेचना आ मार्गदर्शन करैत अछि। पिता पुत्रकेँ पिता बनैत देख’ चाहैछै, मुदा स्वयंके पितामह होइत नहिं देखैछै।





