विद्यानन्द वेदर्दी
जकरा हृदयमे सजाक’ हम चमकैत छी
जकर प्रेम सिंगार अछि हमर
आँखर बनि सभक ठोरपर गमकैत छी
जेँ सिर्जनाक सार अछि हमर
नैनक सोझा नइ आबै
मोनक दोगसँ मुस्कियाबै
एकटा यार अछि हमर
एकटा यार अछि हमर
जखन जखन ओ हमरासँ रूसै,
लिखि लिखिक’ पाँति हम मनाबी
यादमे भगजोगनीसन मन ई उड़ै
उत्सवजकाँ राति हम मनाबी
शब्द हमर सुर, शब्द लय
कवि छियै हमर परिचय
ओ कल्पनाक संसार अछि हमर
मिठ्ठ मिठ्ठ गीत लिखबाबै
मन युद्धमे जीत लिखबाबै
एकटा यार अछि हमर
नैनक सोझा नइ आबै..
काँटोमे देखल करैत छी फूल,
सुन्दर अपन आँखि हम बनाबी
उड़ि रहल अछि आकाशमे धुल,
मजबुत पहिने पाँखि हम बनाबी
फिरै छी हम त पथिक बनि
प्रेम-पथके पैघ रसिक बनि
ओ आत्माक पुकार अछि हमर
खूशीके नोर कनाबै
जीवनके भोर देखाबै
एकटा यार अछि हमर
नैनक सोझा नइ आबै..





