बुद्ध नास्तिक मात्र नइँ अनिश्वरवादी


रोशन जनकपुरी

बुद्ध नास्तिक छल । नास्तिक मात्र नइँ अनिश्वरवादी छल । ओकर तीन टा कहब महत्वपूर्ण अइछ ।
(१) ई जगत दुःखमय अइछ । दुःखके कारण अइछ । दुःखके कारण नइँ जननाइए अज्ञान अइछ । कारणके समाधाने दुःखके समाधान अइछ ।
(२) जाैँ इश्वर अइछ, त दुःख किए अइछ ? जाैँ दुःख अइछ त इश्वरके आवश्यकते किए अइछ ?
(३) अप्प दीपो (द्वीपाे) भव । ( एकर अर्थ अइछ बाैद्ध श्रमणके एहि दुःखमय सागरसन् जगतमे ज्ञानके द्वीप जका हाेबाक चाही, जकरा अज्ञानक दुःख प्रभावित नइँ करैत अइछ, मुदा अज्ञानी हाेबाक भय हमेशा रहैत अइछ, ओहिना जेना समूद्रमे द्वीपके डुइब जायके डर हमेशा बनल रहैछै । बाैद्ध श्रमणके अपन ज्ञानक द्वीपके हमेशा ऊँच करैत रहक चाही । आ ई खूबी दुःखमय जगतमे विचरण कयले स अर्थात् जगतके जनले स प्राप्त हाेइत अइछ ।
प्राकृतमे ‘दीप’क अर्थ द्वीप आ दीप दुनू होइत अइछ । किछु गाेटे गलती स दीप मात्र अर्थ लगबैत छैथ – अप्प दीपाे भव । अपने प्रकाशित होउ ! बुद्ध दीप शब्दके दीप आ द्वीप दुनू अर्थमे प्रयोग कयलक ।
बुद्ध जागतिक छल । अर्थात ओ दुःख, दुःखके कारण आ दुःखके शमन तीनुके जागितक अर्थात् भाैतिक अर्थात् मानवीय मानैत छल । एहे कारण अइछ जे ओकर सम्पूर्ण प्रवचनमे इश्वरके परिभाषा नइँ भेटत । बुद्ध अज्ञेयवादी छल, लेकिन ओकर चिन्तन प्रवृति भाैतिकवादी छल । बुद्ध अनिश्वरवादी प्रत्ययवादी दार्शनिकमे सर्वश्रेष्ठ छल ।
बुद्ध द्वन्दवादी सेहाे छल । ई ओकरा विचारके क्रान्तिकारी सेहाे बनबैत अइछ, जे नित नयाके सिद्धान्तके रूपमे अभिव्यक्त हाेइत अइछ । किछु नइँ स्थिर अइछ, नित नाश हाेइत अइछ, नित जन्मैत अइछ _ क्षणिकवाद। ओ कहलक – पुनर्जन्म नइँ देहान्तरण सम्भव अइछ, जेना एकटा दीप स दाेसर दीप जरैत अइछ, पुरना मिझाइत जाइत अइछ । तहिना एकटा व्यक्तिके गुण, अनुभव, स्मृति ओकर सन्तानमे पुस्तान्तरित हाेइत रहैत अइछ ।
बुद्ध एक दिन एकटा नदीक किनारमे बैसल छल । एकटा पात पाइनमे खसलै आ बहैत चैलगेलै । बुद्धके बाेध भेलै – ओह ! जहिना ई बहल पात नइँ लाैट सकैय, तहिना गेल समय सेहाे नइँ लाैट सकैय । पुनर्जन्म नइँ , बस एकटा जीवन ।
ईहाे त्रासदी अइछ जे सब स बेसी बुद्धेके विचारके विकृत कयल गेल । बुद्ध जे नास्तिक छल आ जागतिक छल ओकराे अवतारवाद स जाेडल गेल ।
बुद्धके विचारके त्रुटि ओकर निरपेक्ष अहिंसा छल जे जडताके सीमा तक पसरल छल । बादमे विकसित शून्यवाद बुद्ध दर्शनके एहन द्वीपमे परिणत क’ देलक जे हिन्दू धर्मक ढाही स ढहैत रहल, मुदा हिन्दू दार्शनिक सबके संघतमे विकसित महायानी नियतमे परिक’ माैन वा निरपेक्ष रहल । अजुका प्रचलित बाैद्ध चिन्तन बुद्धके व्यवहार स दूर एकटा एहने नियतिवादी धर्ममे परिणत क’ देने अइछ । बुद्ध आइ काइल्ह दार्शनिक विवेचन स दूर धार्मिक भगवानमे परिणत भ’ गेल अइछ ।
काेनाे समयमे बुद्ध वैदिक विचार आ कर्मकाण्डके विरूद्ध आलाेचनात्मक दार्शनिक विकल्प छल । लेकिन अजुका बुद्ध एकटा धार्मिक भगवान मात्र अइछ ।. आदि शंकराचार्यके शस्त्र आ शास्त्रक आगू निरीह नियितवादी आ निरपेक्ष अहिंसक बाैद्ध दार्शनिक आ मतावलम्बीसबके समझाैताके कारण बुद्ध विष्णुके अवतार भेल आ शंकराचार्य प्रच्छन्न् बाैद्ध कहायल । अजुका बाैद्ध धर्म एकरे परिणाम अइछ ।
बुद्धके मूल विचार हीनयान कहल गेल आ हिन्दूधर्म स समझाैता स जे जनमल ओ महायान । समय संगे हीनयानमे सेहाे बहस आ चिन्तनके परम्परा समाप्त हाेइत गेल आ ईहाे एकटा पृथक कर्मकाण्डमे परिणत भ’गेल अइछ । तथापि जे किछु बचल अइछ ओ हिनयानिए सब संगे अइछ ।
बुद्ध आ ओकर विचारके दर्शन अर्थात् आलाेचनात्मक दृष्टिए स अर्थात् द्वन्दवादी मात्र भ’क’ बूझल जा सकैय, धार्मिक भ’क’ नइँ ।
आई बुद्ध पूर्णिमा अइ । वैशाख पूर्णिमाके बुद्ध परम्परामे ‘त्रिसंयोग’ कहल जाइत अइछ । बुद्ध वैशाख पूर्णिमेके दिन जन्मल,अही दिन ओकरा ज्ञान अर्थात् बुद्धत्व प्राप्त भेलै आ अही दिन ओकर देहान्त भेलै ।

लेखक जनकपुरी, चर्चित साहित्यका एवम्  विष्लेशक छइथ । सं. 

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