प्लाष्टिक प्रयोग : एक हानिकारक लत 


नारायणप्रसाद घिमिरे 
जल्दी, सहज आ सुलभताके कारण प्रयोग कएल जाएबला प्लाष्टिक आब खाली एकटा समुदाय वा देश नै, बल्कि सम्पूर्ण विश्व लेल गम्भीर चिन्ताक विषय बइन गेल छै। सचमुच, विश्व आइ प्लाष्टिक विरुद्धके लड़ाइमे समर्पित अइछ। प्लाष्टिकक उत्पादन आ उपयोगकेँ कोना समाप्त कएल जाए, ताहिपर वर्षौँसँ अनुसन्धान भ रहल अइछ। प्लाष्टिकक विकल्पमे कोन वस्तु उपयोग होए, ताहि विषयपर प्रत्येक वर्ष अध्ययन रिपोर्ट बनाएल जाइ छै आ सरकारकेँ सिफारिस सेहो कएल जाइत छै, मुदा प्लाष्टिकक प्रयोगमे उल्लेखनीय कमी भेल नै देखाइ छै।

मानव जातिकेँ सहुलियत देबाक उद्देश्यसँ भेल प्लाष्टिकक आविष्कार आइ मथदुख्खीके कारण बइन गेल छै। सायद एतेक हानिकारक बनत, से कियो सोचने नै होएत। स्पष्ट छै, ई आविष्कार केवल मानव नै, बल्कि जीवजन्तु, वनस्पति आ सम्पूर्ण पर्यावरणकेँ संकटमे क देलक अइछ। प्लाष्टिक उत्पादन कएनिहार कम्पनीसभपर कड़ा निगरानी नै भेलासँ ई हानिकारक वस्तुक उत्पादन नै रुकल, बजार नियन्त्रण भ नै सकल, आ उपभोक्ताक व्यवहार सेहो बदलब नै सकल। परिणामस्वरूप, प्लाष्टिकक प्रयोग एकटा लत बइन गेल।

प्लाष्टिकक उपयोगक सुविधा जतेक छै, ओतबे एकरासँ उत्पन्न जोखिम बुझबाक लेल वैज्ञानिक प्रतिवेदन पढ़बाक आवश्यकता नै अइछ। अपनासभक दैनिक जीवन आ व्यवहारसँ ई स्पष्ट देखल जा सकैत अइछ। बजार जाइत काल झोराके आदत छूइट गेल छै। व्यापारी मुफ्तमे प्लाष्टिकक झोरा दैत छै, जे सर्वत्र व्याप्त भ गेल छै। समुद्री जीवजन्तु ओही प्लाष्टिकके जालीमे फँइसके मइर जाइ छै, खेत जोतै काल हरमे प्लाष्टिक अड़ैक जाइ छै।

गामघरमे पोसल गाईभैंसीसँ दूध-दही खेनाए छोइड़ क बजारसँ किनल कोकोकोला पीनाइ आधुनिकताक रूपमे देखल जा रहल छै। दही, मही, घ्यू जेहेन परम्परागत पोषक पदार्थ छोइड़ क आब प्लाष्टिकक बोतलमे भरल कोक, फ्यान्टा आ ड्यूकेँसभके अपनाबै लागल अइछ।

प्लाष्टिक केवल पर्यावरणपर प्रभाव नै क रहल छै, बल्कि समाजक सांस्कृतिक व्यवहार आ स्वास्थ्यपर सेहो गम्भीर असर क रहल अइछ। एकर सस्ता आ सहज उपलब्धता, उपभोक्ताक उदासीनता आ सरकारी निकायसभक ढिलासुस्ती एकर खतराकेँ दिन-प्रतिदिन गहिर बना रहल अइछ। एनामे, आब समय आइब गेल अइछ जे हमसभ मिल क प्लाष्टिकक प्रयोगपर नियन्त्रण करी आ स्वच्छ, टिकाऊ विकल्प अपनाबी। नै तँ ई लत अगिला पीढ़ीक लेल गहिर संकट बइन सकैत अइछ।

प्लाष्टिक प्रदूषण रोकबाक बहस जते गहिर भ रहल छै, ओहिसँ विपरीत स्थिति ई छै जे विशाल हल, महल आ होटलसभमे आयोजन होएबला कार्यक्रमसभमे बहसके बीचोबीच सेहो प्लाष्टिक बोतलमे पाइन परसल जाइ छै – आ एकरा पियैमे नीति निर्माता, सरोकारवाला आ भाषण देनिहार व्यक्तिकेँ कोनो लाज नै होइत छै। प्लाष्टिकके लत एतेक गहिरे बइस गेल छै जे हम बुझैत छी – मानू प्लाष्टिकके बोतल वा वस्तुसभमे जते स्वाद आ सन्तोष छै, से दोसर किछुमे नै छै।

ई खतरनाक लत केवल दैनिक जीवनधैर सीमित नै अइछ। दशमी, दिपावली, छैठ जेहन महत्त्वपूर्ण पावैनसभमे सेहो प्लाष्टिकसँ बनल फूल आ सजावट सामग्री प्रचूर मात्रामे प्रयोग होइ छै। एहन वस्तु विदेशसँ आयात क आनल जाइत छै। प्लाष्टिक आब कृत्रिम आ रंगीचंगी दुनियाँक प्रभावशाली हतियार बइन गेल अइछ। मंचपर प्लाष्टिकक फूलसँ सजावट होइ छै, मुदा कोनो अतिथि वा वक्ता एकर उपयोगपर प्रश्नधैर नै उठबैत छैथ।
प्लाष्टिकक प्रभाव केवल पर्यावरणपर नै, आर्थिक रचनापर सेहो भयावह असर क रहल अइछ। जते प्लाष्टिकके बोरा बढ़ल, ओतबे जुटके बोरा लोप भ गेल। मात्रे बोरा आ डोरी नै, जुट उद्योग सेहो समाप्त भ गेल। पटुवाके खेती बन्द भेल, खेती बन्द भेलाक कारण जुट बनैबला पोखैरी नष्ट भेल। पोखरी समाप्त भेलाक कारण जलचर आ पक्षी संकटमे पड़ल। खास क पुरा मधेश क्षेत्रमे ई पोखैरके नाशसँ भेलासँ पाइनके स्रोतधैर सूइख गेल।

जलसंकटक बहु कारण भ सकैत अइछ, मुदा जुटसँ सम्बन्धित ई परिवर्तन बहुपक्षीय असर करैत अइछ – जाहिमे बृहत्तर अध्ययन जरुरी छै।

शिक्षालयमे शिक्षकसभ बच्चासभकेँ वातावरणक महत्त्व सिखबैत छै, मुदा ओहिना पुस्तकक प्लाष्टिक गाता आ प्लाष्टिक बोतलक उपयोगपर मुँह बन्द रहैत अइछ। पर्यावरण दिवसपर रैली करब, नारा लगाब – ई मात्र परम्परा मात्रे बइन चुकल अइछ।
सभ्यत मानल जाएबला शहरके नदीसभके बदहाल स्थिति केवल शहरीकरणके परिणाम तँ छियै, मुदा एकर जैड़मे प्लाष्टिक सेहो अइछ। सिंहदरबार आ संघीय संसद जते नजदीक बागमती नदीक छवि अइछ, से दुखद छी। हिन्दू आस्थाक केन्द्र पशुपतिनाथ नजदीक रहितो बागमतीक स्थिति भयावह छै। राजधानीक अन्य नदीसभ सेहो प्लाष्टिकके ढेरीमे दबा क मृतप्राय भ गेल अइछ। स्वयं सेवकसभके सफाई अभियान एकटा आशाके संकेत छै। आब तँ प्रकृतिक अधिकारके सेहो चर्चा होइत अइछ। तँ की एहन नदीसभकेँ स्वच्छता आ अस्तित्वमे जीबाक अधिकार नै भेटबाक चाही?

शहरके नदी – नेपाल लेल सौभाग्य अइछ। तखन, हमसभ किए ओही नदीक अस्तित्व माइर देबाक लेल अग्रसर छी? ई गहिर विरोधाभास हटाएब आब आवश्यक अइछ।
नीति, कानून, न्यायालयक आदेश, संविधानक मौलिक हक, अन्तर्राष्ट्रीय मञ्चपर भाषण – सब किछु अइछ। वातावरण मन्त्रालय सक्रिय अइछ, प्लाष्टिक रोकबा लेल निर्देशन समय-समयपर अबैत अइछ। दीर्घकालिन विकास लक्ष्यसभ मानव, समृद्धि आ सहकार्यपर विशेष धीयान दैत अइछ। तखन फेर प्लाष्टिक प्रयोग किए नै घटैत छै? उत्तर स्पष्ट अइछ – व्यवहार, प्रवृत्ति आ नीति बीचक गहिर विरोधाभास।

प्लाष्टिक उपयोग स्वास्थ्यकेँ हानी पहुँचाबै छै, माइटके उपजाउपन घटबैत अइछ, कृषि प्रणाली ध्वस्त करैत अइछ, परम्परागत आचरण नष्ट करैत अइछ, जीवजन्तु आ जलचरकेँ संकटमे करैत अइछ – एखन एहि तथ्यकेँ कोनो विशेष निर्देशन देब आवश्यक नै छै। कारण, एहि समस्त असरकेँ आम जनता सबदिन भ रहल अइछ। ताहि हेतु, आब हरेक उपभोक्ता स्वयं अपन व्यवहारमे सुधार आनब आवश्यक अइछ – इएह एक मात्र उपाय अइछ।
सरकार नियमनकारी निकाय छियै, आओर ओकर मुख्य भूमिका नीति बनौनाए मात्रे नै, ओहि नीति–निर्णयकेँ व्यवहारमे लागू करब सेहो अइछ। अदालतक आदेशक पालना हो, वा प्लाष्टिक जकाँ विनाशकारी वस्तुक नियन्त्रण – की अड़चन छै? की व्यक्ति, संस्था, वा नियम? जाहिसँ विरोधाभास बनल रइह जाइ छै? एहन बाधासभके यथार्थ मूल्याङ्कन क कड़ाईसँ कारबाही होबाक चाही।

एहन मुद्दापर संसदक भूमिका आओर महत्वपूर्ण अइछ। संसद केवल कानुन बनबैबला निकाय नै छियै, ओ जनताके प्रतिनिधित्व करैत छै, सरकारक निगरानी करैत छै आ जनसवालके मुद्दापर आवाज उठबैत अइछ। प्लाष्टिक प्रदूषणके विषय ओहने अइछ जाहिमे संसद सरकारकेँ समय-समयपर सचेत करब आवश्यक अइछ, आ जनताकेँ सूचना द, सहभागितासँ समाधान खोजब सेहो जरूरी छै।

एहि वर्षक वातावरण दिवसक नारा – “प्लाष्टिक प्रदूषण निर्मूल करी।” ई केवल एक दिनका नारा मात्र नै होएबाक चाही। ५ जुनके कार्यक्रम जहिया मंच, भाषण आ पोस्टर देखाइत छै, तरब बाद बचलखुचल ३६४ दिनके सेहो व्यवहारमे धीयान देनाइ जरूरी छै।

जँ हम एक-दोसरकेँ स्वच्छ वातावरणक पाठ पढ़ाबैत, सङे अपन व्यवहारमे सुधार करैत, एक-दोसरक कमीकेँ चिन्हैत आ स्वीकारैत सुधारकेँ किरिया खाइ, तखने प्लाष्टिक विरुद्धके लड़ाइमे दीर्घकालीन सफलता सम्भव छै। रासस

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