
डा. देवेन्द्र नाथ तिवारी
डा. देवेन्द्र नाथ तिवारी
भोजपुरी साहित्य के समृद्ध परंपरा में कइगो अइसन रचनाकार भइले, जवन लोक जिनिगी के पीड़ा, संघर्ष आ संवेदना के आपन लेखनी से जियतार कइले। अइसने एगो सशक्त आ संवेदनशील कवि-गीतकार रहलें, अधीर पिंडवी। असल नाम रहे, रामबहादुर अधीर पिंडवी। देवरिया जनपद (उत्तर प्रदेश) के पिंडी गांव में जनमल, ‘अधीर पिंडवी’ जी खाली पत्रकार के रूप में ना जानल गइनी। भोजपुरी लोकगीत आ सामाजिक चेतना के अनन्य रचनाकार के रूप में भी उहाँ के आपन एगो अमिट छाप छोड़नी।
उहाँ के जिनिगी आ साहित्यिक यात्रा, भोजपुरी लोक जिनिगी में रचल-बसल रहल। आम मनई के आशा, पीड़ा, संघर्ष के संगे-संग सामाजिक कुरीतियन पऽ उहाँ के जम के आपन कलम दउड़वनीं। नतीजतन पाठक आ सुनइया सहजे उहाँ के रचना, सृजन से जुड़लन। पिंडवी जी, पेशा से पत्रकार रहीं। बाकिर उहाँ के मूल मानस, एगो लोककवि के रहऽल। उहाँ के सरोकारी रहीं। शायद एही चलते उहाँ के कविता आ गीत में लोकभाषा के मिठास के संगे-संग सामाजिक यथार्थ के तीख्खड़ चेतना साफ-साफ दिखायी देले।
उहाँ के असल मकसद महज मनोरंजने ना रहल, बलुक सामाजिक जागरूकता आ चेतना के जन-जन तक पहुँचवलो रहल। बाकिर अइसन समर्थ रचनाकार गुमनामे रह गइल। भोजपुरी के साहित्य आलोचक, इतिहासकार आ मठाधीश लोग के नजर से अलोता, पिंडवी जी चुपचाप साहित्य रचना में लागल-भीड़ल रहनी। पिछला साल उहाँ के 77 बरिस के उमिर में एह संसार के छोड़नी। आजु गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला के 27वां कड़ी में अधीर पिंडवी जी के एगो गीत ‘फूटि गइल भगिया’ पऽ बात होई। इ उहाँ के मशहूर गीत हऽ। साहित्यिक योगदान के मार्मिक नमूना। गीत के केंद्र में बा, एगो गरीब परिवार के बेटी के व्यथा-कथा। दहेज ना जुटा पावे के चलते, बियाह से वंचित रहि जाले।
असल में इ गीत खाली एगो बेटी के निजी पीड़ा भर नइखे। समाज में फइलल-पसरल दहेज जइसन कुप्रथा पर एगो पुरहर चोटो बा। एहिजा समाज के ओहि साँच से रउआ परिचित होखऽबि, जवने के हमनी अक्सरहाँ नजरअंदाज कर देलीं। अधीर पिंडवी जी के एह गीत में समाज के बदलाव के पुकार बा। हमनी के सोचे बदे मजबूर करऽता कि का बियाह जइसन पवित्र बंधन के दहेज, जइसन कुप्रथा से मुक्त कइल जा सकता? फिलहाल रउआ गीत देखीं—
‘फूटी गइल भगिया कि रुठि गइने बिधना,
कि सेनुरा ना लिखल लिलार हो।
संग के सहेलिया डोली चढ़ि गइली,
हम रहि गइनी कुंवार हो।।
फूटी..
दूर देश गइने सगुन करि नियरा।
बाबूजी के पगिया झुकल कई दुअरा ।।
सोचि-सोचि माई रोवेली दिन रतिया,
भाई के दुख देखी फाटेला छतिया ।।
कहीं खेत बारी मिले, महल अटारी मिले,
नीक नाहीं मिलेला विचार हो।।
फूटि..
केहू मांगे लाखों, करोड़ केहू मांगे।
बिनु रे दहेज के बढ़े ना बाति आगे ।।
सुनि सुनि जियरा दुखित होला हमरो,
अन्न पानी घर के माहुर जइसे लागे ।।
डूबि मरीं तलवा कि कवनो पोखरिया,
कि डूबि मरीं कुइयां इनार हो।।
फूटि..
एतना दहेज कइसे बाबूजी जुटइहें।
लागता कि खेत खरिहान बिकि जइहें ।।
कइसे पलइहें मोर भाई बहिनियां,
कहवां कमाये वीरन मोर जइहें ।।
करजा जो लीहें अधीर नाहीं उतरी,
बेचलो पर घरवा दुआर
फूटी…’
एह गीत के केंद्रीय भाव, एगो अइसन कन्या के व्यथा से अनुभूत बा, जे नियति (विधाता) से शिकायत करत बिया। नियति, जवन ओकरे बियाह के सुजोग नइखे बना पावऽत। बाकिर अइसन स्थिति कांहे? वजह का बा? इहे कि उनकर बाबूजी के पास दहेज देबे खातिर धन नइखे। रउआ तनिका ध्यान से देखऽब, तऽ एह गीत के पहिलका पंक्ति ही एकरे केंद्रीय भाव के स्थापित करऽतिया—
‘फुटि गइल भगिया कि रुठि गइने बिधना,
कि सेनुरा ना लिखल लिलार हो…’
असल में एहिजा पिंडवी जी, एगो अइसन गरीब कन्या के मन के पीड़ा के व्यक्त कइले बानी, जवन अपने भाग्य के कोसत बिया। ‘फुटि गइल भगिया’ आ ‘रुठि गइने बिधना’ जइसन वाक्यांश ओकरे जिनिगी में व्याप्त निराशा आ असहायता के देखावऽता। ‘सेनुरा ना लिखल लिलार’ में एगो मार्मिक प्रतीकात्मकता बा। सेनुर, जवन बियाह के प्रतीक हऽ, उनका भाग्य में नइखे लिखल, मानो बिधाता उनका जिनिगी में सौभाग्य के रंगे नइखे भरलें। इ भावना गीत के हर छंद में गूंजत बा आ कन्या के दुख के एगो सार्वभौमिक संवेदना में बदल देता।
आगे चलके, ऊ आपन सहेलियन के बियाह देखके कहऽतिया—
‘संग के सहेलिया डोली चढ़ि गइली,
हम रहि गइनी कुंवार हो।’
इ पंक्ति व्यक्तिगत दुख के सामाजिक संदर्भ से जोड़ऽता। सहेलियन के डोली चढ़ल खलिहे एगो घटना भर नइखे, बलुक उनकर अपने स्थिति के साथ एगो तीखा विरोधाभास बा। एहिजा कवि, कन्या के कुंवारी अवस्था के एगो अभिशाप के रूप में चित्रित कइले बाड़न, जवन दहेज के कमी के चलते उनकर नियति बन गइल बा। एह भाव में संवेदनशीलता और मार्मिकता के गहिराह समन्वय बा। इ पाठक भा श्रोता के करेजा के झकझोरऽता।
गीत के एगो प्रमुख आयाम, दहेज के समस्या पर तीखा प्रहार बा। पिंडवी जी, सामाजिक कुरीति के खाली उजागरे नइखन कइले, बलुक एकरे दुष्प्रभावन के बहुते मार्मिक ढंग से प्रस्तुतो कइले बाड़न। बतौर बानगी एह के देखीं—
‘केहू मांगे लाखों, करोड़ केहू मांगे।
बिनु रे दहेज के बढ़े ना बाति आगे।’
एहिजा दहेज के मांग के एगो लालची आ क्रूर व्यवस्था के रूप में चित्रित कइल गइल बा। इ बियाह जइसन पवित्र बंधन के व्यापार में बदल दिहले बा। ‘लाखों’ आ ‘करोड़’ जइसन शब्द एहि मांग के अतिशयता के देखावत बा। गरीब परिवारन खातिर एक लिहाज से एकरा के जुटावऽल असंभव बा। कवि एहिजा दहेज के एगो दानव के रूप में प्रस्तुत करत बाड़न। इ खाली कवनो लइकी के जिनिगी के नाश नइखे करत, बलुक पूरा परिवार के संकट में डालऽता।
एह संकट के चित्रण अउर गहिराता, जब कन्या अपने बाबूजी आ परिवार के स्थिति के देखऽतिया—
‘बाबूजी के पगिया झुकल कई दुअरा।
सोचि-सोचि माई रोवेली दिन रतिया।’
बाबूजी के लाचारी आ माई के लोराइल आँखि एह गीत में दहेज के दुष्प्रभावन के जीवंत चित्र खींचऽता। बाबूजी के कई गो दुआर पऽ सिर झुकावल सामाजिक अपमान के प्रतीक हऽ, माई के रोआई ओहि मूक पीड़ा के, जवन एह व्यवस्था के चलते माई-बाबूजी के झेले के पड़ऽता। पिंडवी जी, एहिजा दहेज के एगो अइसन व्यवस्था के रूप में देखवले बानी, जवन परिवार के मान-सम्मान-आत्मा के कुचल देता।
एह गीत में कन्या खाली अपने नियति पर शिकायत नइखे करत, बलुक अपने परिवार के भविष्य खातिरो चिंतित बिया। इ उनकर संवेदनशीलता के अउर गहिराह करऽता। ऊ कहऽतिया—
‘एतना दहेज कइसे बाबूजी जुटइहें।
लागता कि खेत खरिहान बिकि जइहें।’
एहिजा कन्या एह बात से आशंकित बिया कि उनकरे बियाह खातिर दहेज जुटावे के प्रक्रिया में परिवार के सारा संपत्ति बिक जाई। ‘खेत खरिहान’ के बिकल खाली आर्थिक नुकसाने भर नइखे, बलुक परिवार के आजीविका आ सम्मान के खत्म होखे निशानी हऽ। आगे उ पूछऽतिया—
‘कइसे पलइहें मोर भाई बहिनियां,
कहवां कमाये वीरन मोर जइहें।’
एहिजा आवते-आवत कन्या के दुख व्यक्तिगत से पारिवारिक हो जाला। उ अपने भाई-बहिनियन के भविष्य के चिंता करऽतिया, जवन दहेज के एह मांग के चलते अंधेरे में डूब सकऽता। असल में इ भाव कवि के ओही कला के देखावत बा, जवना में व्यक्तिगत पीड़ा के सामूहिक संकट से जोड़ल दिहल जाला।
गीत के सबसे मार्मिक आ तीव्र क्षण तब आवत बा, जब कन्या आपन स्थिति से अतना त्रस्त हो जाले कि मरे के कामना करे लागऽतिया—
‘डूबि मरीं तलवा कि कवनो पोखरिया,
कि डूबि मरीं कुइयां इनार हो।’
इ पंक्ति दहेज रूपी दानव के उहे भयावह रूप के उजागर करत बा, जवन एगो जवान कन्या के जिनिगी से जियादा, मौत के करीब ले जा रहल बा। ‘तलवा’, ‘पोखरिया’, ‘कुइयां’, ‘इनार’ जइसन सभ जलाशय निराशा के प्रतीक बनऽता, जहवाँ उ अपने जिनिगी के समाप्त करे चाहऽतिया। साँच कहीं तऽ एहिजा पिंडवी जी, दहेज के समस्या के एगो अइसन त्रासदी के रूप में प्रस्तुत कइले बा, जवन मानवता के ही चुनौती देता।
असल में पिंडवी जी के एह गीत में भोजपुरी के खाँटी शब्दन के जमि के प्रयोग भइल बा। इ एकरा के अउर बेसी प्रामाणिक आ मार्मिक बनावत बा। ‘फुटि गइल भगिया’, ‘रुठि गइने बिधना’, ‘डोली चढ़ि गइली’ जइसन वाक्यांश भा मुहावरा लोक जिनिगी के सहजे अभिव्यक्ति हऽ। ग्रामीण परिवेश के सच्चाई के सोझा ले आवऽता। एह भाषा में एगो सरलता बा, जवन भावना के अउर गहिराह करऽता। साथे-साथ ‘सेनुरा’, ‘पगिया’, ‘खरिहान’ जइसन शब्द एह गीत के सांस्कृतिक संदर्भ देता।
एह से इ गीत एगो व्यक्तिगत कथा ना रहि के एगो सामाजिक दस्तावेज बनऽता। गीत के भाषा सरल, बोलचाल के आ गँवई चेतना-परिवेश से प्रेरित बा। ‘फूटि गइल भगिया’ आ ‘रुठि गइने बिधना’ जइसन रूपक आ बिंब कन्या के नियति आ निराशा के प्रभावी ढंग से व्यक्त करऽता। उहें एह गीत के लय आ छंद एकरा के गेय बनावत बा। एकरे चलते इ जनमानस तक आसानी से पहुँचऽता।
साँच पूछीं तऽ ‘फूटि गइल भगिया’ के संदर्भ खाली व्यक्तिगत भर नइखे। भारतीय समाज में दहेज प्रथा के व्यापक प्रभाव के भी देखावऽता। असल में इ गीत हमनी के इ सोचे बदे मजबूर करऽता कि का एगो कन्या के भविष्य खाली दहेजे पर निर्भर होखे के चाहीं? संगे-सग इ सामाजिक चेतना जागृत करे आ एह कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठावे के प्रयासो करऽता। एह तरे, पिंडवी जी के इ गीत एगो संवेदनशील आ शक्तिशाली रचना बनि जाता। एहिजा दहेज जइसन समस्या के एगो गरीब परिवार के नजरिया से प्रस्तुत भइल बा। समाज के एकर दुष्परिणामन खातिर सचेतो करऽता।
साहित्य के सौंदर्य आ एकरे सामाजिक सरोकारन के दृष्टि से इ गीत एगो उत्कृष्ट रचना हऽ। एहिजा संवेदनशीलता आ मार्मिकता के अइसन समन्वय बा, जवन पाठक के भावनात्मक रूप से जोड़ऽता। साथे-साथ दहेज जइसन सामाजिक बुराई पर विचार करे खातिर प्रेरित करऽता। पिंडवी जी, कन्या के मनोभावन के अतना सूक्ष्मता से उकेरले बानी कि उ एगो व्यक्ति से बेसी एगो प्रतीक बनि जाले। ओइसन सभे कन्या के प्रतीक, जवन दहेज के बलि चढ़ऽतिया। दहेजरूपी दानव, एह गीत में एगो केंद्रीय खलनायक के रूप में उभरता। असल में इ खाली धन के मांग नइखे, बलुक एगो अइसन मानसिकता हऽ, जवन मानवीय संबंधन के मोल-तोल के खेल बना देता।
‘बिनु रे दहेज के बढ़े ना बाति आगे’ जइसन वाक्यन से इ उजागर होता। इ दानव परिवार के तोड़ऽता। समाज के संवेदना के कुंद करऽता। गीत के माध्यम से पिंडवी जी के इ सवाल उठवले बानी कि आखिर इ व्यवस्था कब तक चलत रही? इ एगो चुनौती बा, समाज के सोझा, हमनी सभ के सोझा। एकर जवाब तलाशे के होई।
(पिंडवी जी के डिजिटल पेंटिंग)





