ठीके तोँ हमरेसन भेले


अनुवाद कविता:
फहमिदा रियाज । पाकिस्तानके एकटा साहसी, बेबाक आ बुलन्द आवाजबला प्रसिद्ध शायरा । सन्२०२०मे हुनक निधन भेल । पाकिस्तानसन कट्टर इस्लामी बहुल सामाजिकता आ शासन संरचनामे संकीर्ण धार्मिकता आ फासीवादी शासनके विरुद्ध हुनक धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्ध शायरी आ नज्म (कविता) हुनका विशेष बनबैत अइछ। प्रस्तुत अइछ हुनकर एकटा कविताके मैथिली अनुवाद।

भारतमे सामाजिक आ राजनीतिक संरचनामे पसरैत धार्मिक संकीर्णता आ उन्मादके पाकिस्तानी भोग स तुलना करैत ई कविता भीतर तक झकझोरैत अइछ, आ सचेत मनके सोँचबाक लेल विवश करैत अइछ।

विगतमे जे गलती पाकिस्तान कयलक तकर परिणाम फासीवादी राजनीतिक अस्थिरता आ खण्ड खण्ड होइत सामाजिक स्तरपर विखण्डनके दंश पाकिस्तानी समाज भोइग रहल अइछ । ओहे गलती भारतीय समाजके निच्चा स उप्परतक लपेटने जा रहल अइछ। विगत किछु वर्ष स नेपाली समाजमे सेहो ई रोग सम्वेदनशील रुप स चिन्ता बढा रहल अइछ। नेपालमेँ एहने कट्टरता आ धार्मिक उन्माद राजनीतिक आ सामाजिक स्तर पर गरसने जा रहल अइछ। अइ सन्दर्भमे एत्तहु ई कविता सामयिक अइछ।
ठीके तोँ हमरेसन भेले

फहमिदा रियाज
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ठीके तोँ हमरेसन भेले
भाई छले अखनतक कत्त नुकायल
ओ मूरखता ओ घामड़पन
जइमे हमसब शताब्दी गमायल
आखिर तोरो दुआइर पहुँचलौ
बहुत बधाई बहुत बधाई
प्रेत धरमके नाइच रहल छै
कायम हिन्दू राज तोँ करबे ?
उन्टा सब काज तोँ करबे !
अपन बगीचा नाश तोँ करबे
तहूँ बैसल सोँचल करबे
पूरा अइछ ओहने तैयारी
के हिन्दू अइछ, के नइँ अइछ
तहूँ करबे फतबा जारी
होयत कठिन ओत्तहु जीयब
दाँत स निकलत ओतहु पसीना
जेना तेना क’ बीतत समैया
ओत्तहु सबके दम फूलत
माथामेँ सिन्दूरके रेखा
किछुओ परोसिया स नइँ सीखले !
हम की अपन दुर्दशा बनौलहुँ
किछुओ तोरा नजैर नइँ अयलउ ?
तहिया दु:ख स जे सोँचल करी
आइ सोँइच क’ हँसी लगैय
ठीके तोँ हमरेसन भेले
हमसब दूटा ‘कौम’ नइँ छलहुँ भाई ।
इर्खा (इर्ष्या) कर तोँ, आइब जेतै
उन्टे पयरे चलैत जइहे
ध्यान नइँ मनमेँ दोसर आबय
पाछुए मूहेँ तकैत रहिहे
भाँड़मेँ जाओ शिक्षा-विक्षा
आब जाहिलपनके गुन गबिहे
आगू खधिया अइछ देख नइँ ई सब
घुरा क’ ला (ओ) गेल जमाना
एकटा माला जाप करैत रह
बेर बेर दोहरबैत रह
केहन वीर महान छल भारत
केहन आलीशान छल भारत
तखन तहूँसब पहुँच जयबे
बस परलोक पहूँच जयबे
हमसब त छी पहिँनही स ओत्तह
तहूँ समय निकालैत रहिहे
आब जइ नरकमे जइहे ओतह स
चिठ्ठी-विठ्ठी लीखैत रहिरहे ।

प्रस्तुत कविता वरिष्ठ साहित्यकार रोशन जनकपुरीद्वारा अनुवाद कएल गेल अइछ ।

मूल कविता

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्‍टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !
तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्‍या हमने दुर्दशा बनाई
कुछ भी तुमको नजर न आयी?
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।
मश्‍क करो तुम, आ जाएगा
उल्‍टे पाँव चलते जाना
ध्‍यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना
एक जाप सा करते जाओ
बारम्बार यही दोहराओ
कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत
फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना।

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