तोड़ा देह मे मनुख फड़तौ (कथा)


रञ्जु मिश्रा

गामक सीमान पर एकटा बोन रहै।बोनक बीच मे खूब पैघ पोखरि सेहो रहै।पोखरिक कछेर पर एगो बुढबा,पिपरक गाछ रहै ।पोखरि सहित बोनक सब प्राणी ओहि पीपर कें बहुत आदर मान दैक।अपन अपन काज राज स जखन सब निश्चिंत भ जाए तखन ओही पिपरक छाहरि तर बैसैत रहय।नाना तरहक गपशप करैत रहैय।चिड़ै चुनमुन्नी डारि सब पर खोंता लगोने रहय। ओ सब उपरे मे बैसल गप शप करैत छल‌ ।एकटा बुढबा हाथी सेहो ओही गाछ तर अपन बसेर रखने रहय।पिल्लूक टोली घुमंतू रहय। जतय कतहु मरल जानवर सब लोक ओहि बोन में आकि सड़ल गलल किछो फेक दैत रहै छलैक ,ओ ततहि अपन टोल बसा लैत छल।मनुख छोड़ी सब वन्यप्राणीक नीक बस्ती बनल छल ओ बोन।एक दिनुक बात छियै , आपस मे सब बैसल गपशप करैत रहय ।गपक विषय रहै ओकर सभक अस्वस्थता।सब के किछु ने किछु मोन खराब रहै छलै!अही गपशपक क्रम मे

मरल बकरी पर बसल पिल्लूक टोली स रहि रहि ककरो किनब सुनि सभक ध्यान ओमहर चलि जाईक। बड़ी कालक बाद बुढबा पीपर चुनमुन्नी कें कहलकै
–हे गै चुनमुन्नी!तू कनि ओतय जा के देखही त जे ई पिल्लू टोली मे की भेलैय!किएक एते कनै जाइ छै?चुनमुन्नी जे गेल त देखलक जे पिल्लू टोलक एगो किशोरवय छौंड़ा हबोढकार भ कनैय!आओरो पिल्लू सब ओकरा बोल भरोश दैत छै मुदा ओ चुपे नै होई छै!

चुनमुन्नी उड़िकऽ ओकरा लग पहुँचल आ पुछलकै
“की भेलौ बौआ?कतहु चोट लागलौ की?”
पिल्लु हिंचुकैत कहलकै—
“नहि।”

ओहि ठामक जतेक गाछ विरीछ रहै सेहो सब कतबो पूछै त ओ कानब छोड़ि किछु उतारा नहिं दैक।तखन चुनमुन्न ओकर टोलक मुखिया के पुछलकै
-रौ ई एतेक किएक कनै छै? ओ कहलकै

-आई ई छौरा के मोन भेलै घूमै फिरै के, मनुखक बस्ती देखै के, तँ कुकरबाक देह मे सटि चलि गेल घूमै।
गाम मे दू गोटेक बीच झगड़ा फंसल‌ रहै । एक दोसरकेँ गारि दैत खाली एतबेक कहैजे — ‘तोरा देह मे पिल्लु फड़तौ त तोरे देह मे पिल्लू फड़तौ!’एक दोसरा के बेसी पापी कहै आ पिल्लू फरैक शराप दै।आब ई छौंड़ा जवान जहांन छै एकरा बड़ छू देलकै।मान स्वाभिमान पर पड़लै,तैं कनै छै!
सभ हँसए लगल।
छौड़ा पिल्लू के आरो तामस बढि गेलै

-तू सब हंसलें किएक। हम पिल्लु छी त की बड़ खराब छी?हम कोनो जीबैत मौस पर फरै छी?हम त मरल के साफ करै छी।हम सब नै रहबै त ओ मनुख मरलाहा जीबक दर्गंध स मरि जाएत। एहि मे कोन पाप ! हमर दोष की छै?”
सब कियो चुप भऽ गेल।बसात के ई बात भीतर तक धंसि गेलै ओ गुम भ गेल।पीपर कहलकै
-रौ बसतबा !तू कथीक सोच मे पड़ि गेलही जे बहनाई बंद क देलं।सांस-बाक बंद अछि।बहैत रह ,तखन ने किछु विचारो विमर्श करब!
पोखरियो चुप छल ‌।पैन मे स झुनकुटहा कछुआ निकलि ससरि केँ आगाँ बढ़ल।
ओ बहुत पुरान छल , मनुखक कतेको पीढ़ी के देखनेछल।

कछुआ ओकरा परबोधैक लेल पुछलक—
“बौआ, तूँ की करै छह?”
पिल्लु उत्तर देलक—
“जे सड़ि जाइत छै,हम सब त ओकरे खाइ छी।”
“जीवित गाछ काटै छह?”
“नहि त।”
“जलाशय सब मे जहर घोरैत छह, गन्दा करैत छह?”
“नहि।”
“अपन बच्चा सँ नाम गाम आ पाईक उमीद करैत छह?”
“नहि !हमरा सबके त अपन हाथ जगरनाथ !
“आवश्यकता सँ बेसी खाइ छह, कि भविष्य लेल चोरा चोरा संग्रह करैत छह?”
“नहि।”
कछुआ विंहुंसि देलक।
“तँ फेर तोरा किएक दुख ,तू त भगवानक बनौल सृष्टि मे कनियों अपन मूलधर्म के त्याग नहि केलह?”
“मुदा तैयो लोक गारि तँ हमरा नाम सँ दैत छै!”
पिल्लु फेर कानए लगल।

ओही ठाम ठाढ एकटा सुखायल सन रुग्न गाछ बाजल
“हे देखही बौआ!हमरदशा देखै छीही ।ई मनुख केने अछि ।जखन मोन होई छै बिनु काजे सबटा काटि फाटि के राखि दैत अछि।काजे भरि लेत त हमर ई दशा नहि होइत”मनुख स्वयं मे बड पापी अछि।ओ की बाजत!
पोखरि कहलकै—

“सुन !कहियो हमरो सौंदर्य छल ।झकझक हिलकोर मारैत हरियर कंच पैन।मनुखक संग सब जीब जंतु जुड़ाईत छल।आब हमर गति देख ले।जतेक कचरा मचरा होइत छैक हमरे मे ध दैत अछि।एतबेक नहि अपन पैखानाकपाइपो हमरे मे द दैय’हमर पैन गंध करैत अछि ,हमरा भरि दिन जी ओकियैत अछि।मोन त होईत अछि मरि जाई ।सुखा जाई मुदा जीवन मरण त भगवानेकहाथ मे छनि ।तू कह हमरा स बेसी कष्ट त तोरा नहि छौ मनुख स?मुदा हमहूं अपन काज करै छी जाबत सामर्थ अछि।तहूं अपन काज कर ‌ऐ सब पर धियान नहि दही।
बसात बड़ी काल स सभक गप सुनै छल।निसांस लैत बाजल
“ई देखही जे हमही मनुखक प्राण छीयै मुदा तकरो पैत ओ नहि रखैत अछि।अपन सुखक वास्ते दूषित क देने अछि हमरा ।जहर लगैय अपनहिं सांस।हमरा विषतत्वी बनएलक मनुख।”

चिड़ै सब झौहरि करय लागल
सब के अपने दुख सुझाई छौ कनी हमरो दिस धियान दही न।ऐ मनुखक दुआरे हमर त वंशे बूरि जाएत आब।हम त राति दिन सबटा बिसरि गेलियै जे कखन होई छै।बिजली बत्ती मे भ्रम भ जाइय कि दिन छै कि राति।ततेक जोर स बाजा बजबैय जे हम अपन बोलीक उपयोग नहि क पबै छी।हम कैल्हे अपन‌जोड़ा के बजबैत बजबैत थाकि गेलहुं जे तू खोंता मे आ हम आब दाना लेल जाइ छी ,मुदा डीजे मे किछु नहि सुनलकै।
सभ एक-दोसराक मुँह देखए लगल।
पिल्लु आश्चर्य सँ पूछलक—

तखन तँ मनुख सन खराप कियो नै, फेर गारि हमर नाम सँ किएक दैत आछि।डकैत त ओ अपनहि अछि?”
एहि प्रश्न पर कछुआ ठहाका मारि कऽ हँसि पड़ल।
सभ चौंकल।
“तोरा की भेलौ?”
कछुआ कहलै—
“एहेन बात छै बौआ, जे मनुख बहुत चतुर जीव होइत अछि।तेहने अहंकार !ओ भांजे नै लागै देतौ जे हम ऐ सब के नष्ट क रहल छी।ओकर भीतर आ बाहरक रुप एक दोसरक व्याघत छै।बहुरुपिया छी।

पीपर तर बैसल हाथी सबटा सुनेत रहल।जखन कछुआ कहलकै जे मनुख बड चलाक होईय त रहल नहि गेलै।कहलकै
तू सब हमरा स बेसी की भोगमे
एकटा गप कहै छीयौ ,हमर पूर्वज हमरा सबके खिस्सा कहने रहय!

” मनुख स पहिने धरती पर चिड़ै चुनमुन्नीक पशुपक्षी वास छलै ।सब आनंद मंगल‌ स रहैत रहय।जखन मनुखक प्रादुर्भाव भेलै त शारदुल कहलकै हाथी के जे आब एतय मनुखक प्रवेश भ गेलै।ओ बहुत खतरनाक होइत छै।ओकर वुद्धि तीक्ष्ण होइत छै।अपना सब पर राज करतौ।प्रकृतिक बनौल सिस्टम के नाश क देतौ।हाथी कहलकैक जे मनुख केहन होइ छै?

मनुखक आधा धर चीड़ल.रहै छै।दू टा पैर पर ठाढ रहै छै।मुदा बहुत घाघ बुद्धि होईत छैक।कृतघ्न ,धोखेबाज स्वार्थी !केहनो पाप क सकैत अछि ,तैं हमरा डर होइत अछि ।मुदा हाथी के अपन विशाल शरीर पर बहुत घमंड न होई छै ,कहलकै

-एंह!ओकर अधहा धर जखन चीड़ले रहै छै तखन कोन डर! अधहा के त हम क्षण मे चीड़ देबै।ओ की राज करत हमरा पर।हम कतहु नै जाएब!
शारदुल कहलकै” हे हम तीन बेर कहै छीयौ तू पछतेबह ,चल एतय सं।हाथी नहिंयें टा गेल आ शारदुल चलि गेल!कनी दिनुक बाद सगरो धरती पर मनुख रुपी राक्षस पसरि गेल ।अपन पेट आ घेंट लेल कोनहु धर्म विवेक नहिं ओकरा नहि छैक।ओ हाथी के देखलक ।ओकर बहुत उपयोगी बुझना गेलैक ,जे एकरा पीठ पर बैसि हमर बहुतों काज आसानी सं भ जाएत ‌।जोगाड़ लगौलक ।

मनुख एकटा पैघ तरहारा खुनि उपड़ स टाट द झांपि देलक ।हाथी के बुझबा मे नहिं एलै ।ओहि पर जैं की पएर देलकै कि भारी शरीर खादि मे खसि पड़ल आ मनुख ओकरा फंसा लेलकै सवारी करैत कान मे अंकुश द विवश क देलक।तहिया स जखन जखन हाथीक कान मे अंकुश पड़ै छै तखन तखन शारदुलक बात मोन पड़ैत छैक आ हम हाथीक जाति तीन बेर सूंढ सं धूरा फेकैत हुंहंकैत छी ,पश्चाताप करैत छी जे शारदुलक बात किएक नहि मानलौ!!!
-जखन एहि धरती पर मनुख नहि आएल रहै तखन सब जीब आनंदे आनंद छल नै हौ!ओह!ई दैत कत्त स आबि गेल!चुनमुन्नी चनचनाय लागल
-अपन गलतीक मोटा दोसराक माथ पर राखि दैत अछि आ अपने पाक साफ।”
सभ गोटे हँसए लगल

मुदा पिल्लुक मोन मे अपन अपमान एखनहुँ धेनहिं छलै।
ओ जिद्द कऽ बैसल—
“नहि! काल्हि हम गाम जाएब। आ आदमी सभसँ पूछब जे हमर अपराध की छै? सबटा पाप त वैह करैत अछि ।हम सब त भगवानक नियम पर चलै छी।जतबे खेबाक ततबे खाई छी ।संग्रह नै करै छी।सब कियो मना केलकै
-नै नै जो नै !ओ सब खुंखार छै ।एकटा काज कर।
-की?

आब अपनहुं सब मे जं कियो अपन धर्म छोड़ै -अपराध करै त हमहूं सब शराप देबै।
“तोरा देह मनुख फरतौ!”सब बदला ल लेबै!
ई बात सब के बड नीक लगलै।

हवा झूलि झूलि नाच करै लागल,चिड़ै सब गीत गाबै लागल,पोखरि हिलकोर पर हिलकोर मारै लागल।जेना कोनहुं उत्सव होई।
ओही काल कोनो मनुख महार पर बैसि सबटा एकर सभक गप चुपचाप सुनै छल।ओ जे गाम पर गेल त सबके बजा सबटा गप कहि देलकै
-देखही अपना सब के कतेक अपमानक बात भेल जे पिल्लू सभ कहै छै जे तोरा देह मे मनुख फड़तौ!
दोसर कहलके
-अरौ तोड़ी के,ओकर सभक ई मजाल!
तेसर कहलकै
-रौ भाई कैल्ह हमहू सुनने रहियै मुदा तोरा सबके कहब बिसरि गेलियौ,किएक त मोबाइल दुआरे हमरा किछ मोन नै रहैय”सब नियार करै लागल जे आब की कयल जाए।एहन अपमान त नहि सहि सकै छी।
-रौ चल ने हमरा सभक आगू ओकर सभक की अस्तित्व छै।जुमि के चलै चल ,तहस नहस क देबै सबटा के!जखन बुझेतै जे के ऐ धरती पर पैघ अछि।
-हंहं !चलै चल!
सब कियो पघरिया ,हांसू ,जहर ल तैयार भ गेल
एकटा बुढबा सब गप गंभीरता स सुनै छल‌।
कहलकै
—सुन! तू ककरा तहस-नहस करबहक? ओकरा बिना तोहर जीवन छह?
पोखरि के सुखा देबहक तँ अपनहि पियासे मरबह।
गाछ काटि देबह तँ सांस कोना लेबह।वैह त आक्सीजन दैत छह।
चिड़ै मारि देबहक तँ खेत कीड़ा सँ भरि जएत।

बसात विषाक्त भऽ गेल तँ तोरा नानारंगक बीमारी ध लेतह।
जकरा मिटाबय चलल छह, ओहि पर तँ तोहर अस्तित्व टिकल छह।”तोरा सब जतेक ओकर सभक नोकसान केलहक तकर प्रायश्चित करय पड़तह।भगवानक सृष्टि मे एहन व्यवस्था छैक जे सभक निर्भरता एक दोसरापर आश्रित छैक।नहिं जं अहिना रहबह तं तोंहीं नष्ट भ जेबह!सभ किछु काल चुप भऽ गेल।
एकटा छौंड़ा धीरे सँ बाजल—

“तखन की करिऐ? अपमानो सहि लिऐ?”बुढबा हँसल।”अपमान तँ ओहि दिन भेल जखन मनुखक नाम सुनिते पशु-पक्षी डेराए लगल।अपमान तँ ओहि दिन भेल जखन गाछ, पोखरि, हवा आ चिड़ै सभ अपन दुखक कारण मनुख केँदुश्मन बूझै लागल ।ओ सभ तँ हमरे सुखक लेल अछि।ओकरा कहां अपना लेल किछु चाहियै।जे हमर रक्षा करैत अअछि हम सब तकरे हत्या करैत एलौं एखन धरि। सभाक मुड़ी झुकि गेल।ओही समय दूर बोन दिस सँ दू टा कुत्ता मे लड़ाई फंसि गेलै।करिकबा कुत्ता अपना बच्चा सब लेल कतौ स हड्डी अनैत छल ,बीचहि मे गोलबा कुकुर ओकरा स मारि के छीन लेलकै।करिया गरियाबै ,”तोरा देह मे मनुख फड़तौ !गोला मजा स खाईत रहय आ ओकरो कहि दै ,जे तोरे देह मे मनुख फड़तौ!

तोरा देह मे खद खद मनुख फड़तौ
“तोरे देह मे सह सह मनुख फड़तौ …ओकर दूनूक झगड़ा देखि गाछ विरिछ, पिल्लू संग सब कियो ठिठिया रहल छल।आ मनुखक टोली मूड़ी गोंतने छल।

ताजा खबर
लोकप्रिय