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साहित्य
सिरी संपादक जी, गोर लगैत छी । हाथ कहिआ लगबै ?
एकबेर लइयो दइयो क केहुना क बात व्यवस्था मिला दिऔ
‘फुटि गइल भगिया कि रुठि गइने बिधना’
पतिया रोई-रोई ना, लिखावे रजमतिया’
बैतडीक बसकोट : शहिद दशरथ चन्दक आङनमे
एकरा पाछू ऊ (खिस्सा)
अखन बाँकी अछि
गजल (भोजपुरी)
मिथिला मधेशक कर्मयोगी साधक अशोक दत्त
प्रेम आ प्रेम विवाहः तहिया आ आब
हरियर गाछ आ’ लाल फूल
घोङ्हि (थारू कविता)
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