नित्यानन्द मण्डल
मैथिली लोक तथा आधुनिक गीति काव्य साहित्यमे पानिक महत्ता मादे व्यक्त पाँति सभक मादे मधेश प्रदेशमे पानिक स्थिति सम्बन्धमे किछु कहबाक धृष्टता क रहल छी । टटके वितल छठिमे नदि,सागर, सरोबरि पोखरि, इनार आदि जलाशयसभमे पानि सेहो बहुत कम देखवामे आएल । कतौं कतौं मात्र धानक शिस नीक छल, नहि त अधिकांश ठाम धान जरि गेल । कहबाक तात्पर्य जे चौर सुखले, चाँचर सुखले, राजाजीक पोखरि सुखले……। पानि विनु परलै अकाले हो राम…….। …..खतबामे छप्पर छुप्पर पनियाँ ताहिमे नहाय……हो राम । दयो नै लगैए, हो इनर देवता । एहिसँ ई अनुमान सहजै लगाओल जा सकैए जे मिथिलामे पानिक हाहाकार बहुत पहिनहिँ सँ अछि । तैं त राजा जनकजी स्वयं हर जोतने छलाह । मुदा प्रसिद्ध मैथिली गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरजी आशाकेर किरण देखैत छथि । ओ कहैत छथि
हम झेलम नहायब, हम सतलजो नहायब
हम गंगो मे नहायब, हम त्रिवेणीयो नहायब
मुदा मिथिलेके जलसँ भरब गगरी
हम छी सीता हमर ई जनक नगरी
किरण उगलो ने हएत हम कातिक नहायब
माघ मासो नहायब बैसाखो नहायब
अकासेमे आइ अपन नूआ सुखायब
हम छी सीता हमर ई जनक नगरी
एहिबेर सखी हे सावनकेर बुनझिसी, पियासँग खेलब पचिसी ना….। बुँदिया जे बरसन लागे…….। मेघवा जे गर्जन लागे… लगायतक पावस,कजरी गीत सभ सेहो सुनवामे नहि आएल । किएक त साओन भादोमे सेहो सुख्खा रहल मधेश ।
कहबाक कोनो जरुरति नहि जे खरनादिनसँ सामा चकेवा सेहो सुरु भ गेल अछि । जाहिमे गाओल जाइत अछि वृन्दावनमे आगि लगले केओ ने मुझावे हे…..। जखन पानिए ने अछि त जंगलमे लागल आगि कोना क मुझाओल जा सकैए । एहिँ तरहेँ, गामके अधिकारी आहाँ फल्लनां भैय्या भैय्या पोखरी खुनाय दहो, चम्पा फुल लगाय दहो हे….। हँ, आब पानिक रिचार्जक स्रोत रहल जलाशयसभके सौन्दर्यीकरण मात्र नहि की राजा जनकजी जेकाँ अपना जनताप्रतिक दायित्व निर्वाह करबाक लेल चुरिया क्षेत्रमे पानिक ड्याम, पोखरि खुनाएब अखनुका तीनू तहक सरकार आ जनप्रतिनिधि लोकनिक उत्तरदायित्व बेसी बढि गेल अछि ।
मधेश प्रदेशक राजधानी जनकपुरधाम, उपमहानगर वीरगञ्ज, जलक धनिक रहल जलेश्वरमे सेहो पानिक लेअर कमभेलासँ ४ सयसँ ल क साढे ५ सयफिट धरिक चापाकलसँ मात्र पानि आवि रहल बात विदिते अछि । साहए त कहल, जखन पिबयबाला पानिक कोनो विकल्प नहि रहल समयमे अन्न आ जलक भण्डार मानलगेल मधेश आब अन्न आ पानि विनु तरसतसे पूर्वाअनुमान विज्ञ लोकनि क रहलाह अछि । तैं त काव्यशिल्पी धीरेन्द्र प्रेमर्षिक किछु पर्यावरणीय गीतसभ सान्दर्भिक बुझना जाइत अछि । एहिगीतसभ मादे ओ जागरण मात्र नहि श्रम, श्वेतक बलें आशाककेर सम्भावना सेहो अकुंरित करैत छथि ।
१. चुरिया गीत
चुरिया–चुरिया सब कहै, चुरिया बस एक पहाड़ यौ
मुदा इएह छै मिथिला–मधेश– देशक प्राणआधार यौ
सोचियौ तँ कने पहिने जहिया सौँसे चुरिया जंगल छल
अन्न–पानिके कमी ने होइ छल, जिनगी सभक सुमंगल छल
जहियासँ चुरियाक सम्पदा बनल महा–व्यापार यौ
तहिएसँ जनजनके तिलतिल लागल जरऽ कपार यौ
जाधरि रहत सुरक्षित चुरिया ता जमीनमे पानि छै
गिट्टी, बालु आ काठे नइ, सब साधनके ई खानि छै
चुरिये करतै रौदी–दाहरिसन कष्टक संहार यौ
अन्नपात फेर उपजल ओहिना लागत धन अम्बार यौ
चुरियाके संरक्षणदिस जँ चलबै हमसभ लक्षित भऽ
रोजी–रोटी देत इएह, विपदोसँ रहब सुरक्षित भऽ
चलू करी चुरियेके नाङरि धऽ वैतरणी पार यौ
उन्नतिके शिखर चढ़बालए चुरिए बुझू कहार यौ
२. जलाधि गीत
कथी कहैए माटि से सुनियौ, कनैए कोन बियाधिसँ?
की–की पेलियै कथी गमेलियै अप्पन धार जलाधिसँ !
पहिने कल–कल पानि बहै तँ खल–खल बाधो हँसै छलै
हरियर नूआ पहिरि खेतसभ सदिखन छम–छम नचै छलै
पाउज करैत छल मालजाल भऽ तिरपित अपने नादिसँ
की–की पेलियै कथी गमेलियै अपन ई धार जलाधिसँ !
आइ जलाधिमे पानिक बदला बालु आ पाथर पसरल छै
सुदिखौका सेठबाक धोधिसन देखू कोना ई चतरल छै
कहियो कण्ठ जरैत अछि प्यासल, मरै छी कहियो बाढि़सँ
की–की पेलियै कथी गमेलियै अपन ई धार जलाधिसँ !
अमृत जइठाँ फड़ै–फुलै छल, से छल हमरे चुरिया यौ
हमरेसभक अधक्कीपनसँ बनल ई जहरक पुडि़या यौ
चलू फेर हरिआबी एकरा ज्ञान आ कर्मक खाधिसँ
की–की पेलियै कथी गमेलियै अपन ई धार जलाधिसँ !
३. जल–संरक्षण गीत
बरखाक बुन्न–बुन्न कऽकऽ सङोर
धरती पटाएब जखन बरिसत अङोर
रौदीक राहु जखन पेरै किसानकेँ
दुर्दिनक दैत्य जखन घेरै किसानकेँ
सिँचत ओ एहनेमे पपडि़आएल ठोर
गुजगुज अन्हारबीच छिटकत इजोर
नेहक नहरिमे रहै सदति पानि जेँ
जिनगी सहजतासँ लैक केओ तानि तेँ
दुखसुखमे गँठजोर करबै जेँ नोर
हिरदयके सागरमे उठै तेँ हिलोर
सैँती आ सेवी तँ पाथरोमे देव छै
मनमे जतन नइ तँ दुनिया फरेब छै
अरियो–उछालमे जँ ध्यान देबै थोड़
जेठो जुड़ाएब पाबि जुड़शीतल भोर
Just like the famous line, ‘water, water everywhere and not a drop to drink’, in Samuel Taylor Coleridge’s poem, ‘The Rime of the Ancient Mariner’, water is around us but is often not clean or safe enough to drink. The lack of clean or safe water is a global problem, which, if unaddressed, will lead to an unsustainable future as the global population increases from 7.5 billion today to a predicted 9 billion by 2050.
एहिँ तरहे मैथिली गीतिकाव्य संसारमे पानिक महत्ता समय आ भाव अनुसार देखल जा सकैए । एहिमें बहुत काव्यशिल्पी लोकनिक सृजनके समेटि नहि सकल हएब, तकरा लेल माफी चाहैत छी । हमरा लग उपलब्ध आ हमर अध्ययनक सीमा अनुसार उपर्यूक्त रचनासभके सहेजबाक प्रयत्न कएल गेल अछि । तैं, एहि तरहेँ सेहो अध्ययन कएल जा सकैय से एकटा प्रयास अपने लोकनिके केहन लागल ?





