काठमाण्डू, १ आसिनः प्रत्येक साल आश्विन सङ्क्रान्तिक दिन विश्वकर्माक विधिपूर्वक पूजाआराधना कएल जाइत अइछ। विभिन्न कल-कारखानामे विश्वकर्मा भगवानक तस्वीर वा मूर्ती बना क विधिपूर्वक पूजाआराधना कएल जाइत अइछ।
कल-कारखानाकेँ विशेष रूपसँ सजाक श्रमिकसभ ई पूजा भव्यताक सङ मनबैत छैथ। माइटसँ बनाएल विश्वकर्माक मूर्तिकेँ वाग्मतीक उद्गमस्थल सुन्दरीजल, नदी पोखैरमे विसर्जन कएल जाइत अइछ।
आजुक दिन औजारके पूजाआराधना कएलापर बहुत दिनधैर टिकबाक, काजक समयमे खराब नै होबाक आ नीक काज क सकबाक लेल गुण प्राप्त हएत से धार्मिक विश्वास अइछ।
द्वापर युगमे भगवान कृष्णकेँ राक्षस दुःख देलाक बाद विश्वकर्मा समुद्रके बीच ‘भेद द्वारका’ बना क हुनका नुकौने छलाह, से धार्मिक विश्वास अइछ। एक्के राइतमे समुद्रके बीच ‘भेद द्वारका’ निर्माण कएलासँ विश्वकर्माकेँ सफल वास्तुविद् माइन क ओइ समयसँ हुनकर पूजा करबाक परम्परा चलल से प्रो. तोयराज नेपाल बतौलैन।
प्राचीन भारतवर्षके चारू दिशाके रक्षक देवतामे द्वारकाकेँ पश्चिम दिशाके रक्षक सेहो मानल जाइत अइछ। विश्वकर्माद्वारा निर्मित ‘भेद द्वारका’ एखनो भारतके गुजरातमे समुद्रक बीचमे रहल विश्वास कएल जाइत अइछ। विश्वकर्माकेँ वास्तु विद्याक विशिष्ट ज्ञाता सेहो मानल जाइत अइछ। ‘विश्वकर्मा प्रकाश’ नामक वास्तुशास्त्रक ग्रन्थ ओहेन रचना कएने वास्तुशास्त्री शिव पोखरेल बतौलैन।
वास्तुशास्त्रके पुस्तकके लेखक एवम् अध्येताक स्मरणमे वास्तुविद्सभ आइ वास्तु दिवस मनबैत छैथ। (रासस)





