संतानक कुशलताक लेल कएल जाएबला जितिया पावैन शुरू


सप्तरी, १६ आसिनः नेपालमे रहनिहार विभिन्न क्षेत्रमे विभिन्न परपावैन, रीतिरिवाज तथा संस्कृति मनेबाक विविधता अइछ । पर-पावैन तथा संस्कृतिसँ अपनासभकेँ विश्वमे परिचित करौने अइछ । मिथिलाक संस्कृति, पर-पावैन तथा रीतिरिवाजक सेहो अलग महत्व आ विशेषता अइछ । मिथिला–मधेशमे मनाएल जाएबला पर-पावैनमे जीतिया एक अइछ । ई व्रत संतान प्राप्ति तथा सन्तानक दीर्घायु आ सुस्वास्थ्य तथा सन्तानप्रतिक ममतासँ जुड़ल कठोर पावैन अइछ । ई पावैन प्राचीन समयसँ महिलासभ करैत आइब रहल छैथ ।

एहि वर्ष आइ षष्ठी तिथिसँ महिलासभ ई व्रत विधिपूर्वक शुरू कएने छैथ । आइ पोखैर वा तलावमे नहा क विधिपूर्वक पावैनके प्रक्रिया शुरू होएत आ शैनदिनके सप्तमी तिथिधैर निराहार रइह क पावैन पूरा होएत।

पावैनके विधि

ई पावैन एक दिन पहिने भोरे उइठ क घर-अङ्गना निप क साफ करैत छैथ । तोरी, तेल, घेराके पात, जियलके पात, बाँसके पात तथा नवका कपड़ा ल क महिलासभ पोखैर, नदी वा जलाशयमे जा क नहाबैत छैथ । नवका कपड़ा पहिर पितृ तथा ‘जिमुतवाहन’ देवताकेँ पिना आ तेल चढ़बैत छैथ ।

पावैनके पहिल दिन अष्टमी तिथिक दिन सङ्कल्प लैत छैथ । व्रतीसभ दिवङ्गत दादी, साउस लगायत तीन पुस्ताभित्रके पितृ महिलाकेँ तर्पण देबाक चलन अइछ । अइ व्रतकेँ षोडश मातृका श्राद्ध सेहो कहल जाइत छै से राजविराज नगरपालिका–२ क ७५ वर्षीय शम्भु मिश्र बतौलैन ।

पावैनके एक दिन पहिने साँझमे महिलासभ विभिन्न प्रकारक भोजन, दही, मिठाइ आ मडुवाक रोटी अनिवार्य रूपसँ सेवन करबाक चलन अइछ । दोसर दिन भोरे ३ः०० बजेसँ ४ः०० बजेधैर व्रती अङ्गनामे घेराके पातपर पितृ तथा जिमुतवाहनकेँ दही, चुरा, चिनी, केरा, मिठाइ, पान तथा सुपारी चढ़बैत छैथ ।

पावैनके साँझमे नारियल, फलफूल लगायत पूजाक सामग्री राइख डाली भरल जाइत अइछ । डालीकेँ मानके पातसँ बेटा झाँइप दैत छैथ । पावैनके समय पूरा भेलापर घरमे रहल बेटा वा नाइत डाली खोलैत छैथ । डालीसँ प्रसाद निकाइल फेर पितृ तथा जिमुतवाहनकेँ चढ़ा क सबकेँ बाँइट देलाक बाद व्रती महिला पाइन पीबैत भोजन करैत छैथ ।

पावैनमे व्रती महिलाके स्वास्थ्यमे समस्या अएलोपर, व्रत नै तोड़बाक परम्परा अइछ । संतानक दीर्घायु तथा सुस्वास्थ्यक लेल अनिवार्य रूपसँ व्रत करैत छैथ ।

हाल जितियाके नामपर विभिन्न कार्यक्रमसभ सेहो आयोजन होइत अइछ। जितिया सम्बन्धी गीत, कथा लगायत महिलामे रहल प्रतिभा प्रस्तुत करबाक अवसर सामूहिक कार्यक्रममे होइत अइछ । जियल, बाँस, मान तथा घेराके पात अनिवार्य रूपसँ चढ़ाएल जाइत छै । ताहि कारण प्रकृति तथा पर्यावरणक रक्षा कएलापर मात्रे एकर गाछी बचल रहत सेहो सन्देश अइ पावैनसँ जाइत अइछ ।

सोह्रश्राद्ध शुरू भेल समयमे ई व्रत करबाक चलन रहलाक कारण अइ व्रतमे बेटी तथा पुतौहुसभ पितृकेँ सम्मान करैत छैथ । बेटा मात्र सोह्रश्राद्धमे पितृक श्राद्ध करबाक प्रचलनमे सकारात्मक परिवर्तन करैत कतौ-कतौ बेटीद्वारा शुरू कएल गेलोपर अइ पावैनमे शताब्दीसँ मिथिलामे महिलासभ सेहो पितृकेँ पाइन देबाक, प्रसादी चढ़ेबाक चलन अइछ ।

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