जीवनक एक महत्वपूर्ण संस्मरण


प्रवीण नारायण चौधरी

गामक बच्चा अछि । गामहि केर पढ़ाइ-लिखाइ मे बढ़ि रहल अछि । गाम मे प्रचलित धियापुताक खेल, कला-कौशल, लोकसमाज आदिक थोड़-बहुत ज्ञान भेल छैक । गामक धियापुता सब केँ आर सुसंस्कृत आ शिक्षा सँ जोड़िकय रखबाक लेल बहुत नीक-नीक परम्परा सभक विकास भेल छैक । जे गाम जतेक संस्कारी, ओहि गाम मे ओतबे बुधियारी । भिन्न-भिन्न तरहक खेल, मनोरंजन, नाच, तमाशा, सामाजिक काज, धार्मिक काज, आदि सबटा मे लोक-वेद केर भरपूर मिश्रण ।

हमरा गामक पोखरि महाड़ पर सब दिन सीनियर विद्यार्थी सब जुनियर विद्यार्थी सब केँ बजबैत छथि । के विद्यार्थी ओहि दिन कि पढ़लक – कि सिखलक से सबटा पूछताछ कयल जाइत छैक । बीच-बीच मे केकरो पिहकारी त केकरो ताली सँ तिरस्कृत-पुरस्कृत सेहो कयल जाइत छैक । एना करबाक ध्येय केकरो बिगाड़ब आ कि बूड़ि बनायब से नहि, बल्कि सब बच्चा मे शिक्षा आ संस्कार प्रति सचेत बनायब रहैक । एहि तरहें धियापुता मे प्रतिभा प्रदर्शनक एकटा होड़ लागल रहैत छैक । हम नीक त हम नीक – ई सिद्ध करहे लेल एहि तरहक मजलिस लागल करैछ ।
गामक बच्चा सभक बीच मे आबि जाइछ कोनो शहरक बच्चा । तखन देखू खेला-वेला । सीनियर सब ओहि शहरी बच्चाक शहरिया प्रतिभाक ततबी ढोल पीटैत छथि जे पुछू जुनि । लेकिन गामक बच्चा मे जतेक ठोस ज्ञान आ संस्कार भेटत, से शहरक बच्चा मे किन्नहुं नहि भेटत ।

गामक खेलधूप सेहो संस्कारे सिखबैत छैक । कलम-गाछी या खेत पर जायब, धान-गहुँम कटबायब, जन-बोनिहारक संग घरक जरूरी काज मे लागब, दोकान सँ घरक वास्ते जरूरी सामान किनिकय आयब, हाट पर सँ तरकारी किनिकय आनब, पोखरि मे हेलब कि गुरकुनियाँ छानब, चोर-नुकैया, झुटका-झुटकी, अठ्ठा-बघन्डो, आदिक खेल खेलायब, मड़ुुवा ढेरी करब, धियेपुता सँ नाटक खेलायब, आदि अनेकों बात मे लोक कि आ वेद कि – एहेन गूढ़ ज्ञान केर प्रवेश बच्चे सँ होइत रहैत छैक । ई सब बात शहरी धियापुता मे नहि भेटत ।

आब हमरो गाम मे हमर समय कोनो शहरी बच्चा आयल । पोखरिक महाड़ पर मजलिस लागल । शहरी बच्चाक वाहवाह, हमरा पिहकारीक धाह । बड खराब लागल । सोचलहुँ जे ई शहरी केँ केना पटकी । पटकी माने मारि सँ नहि, पढ़ाइ सँ । गणित मे माहिर रहबे करी, आब ओकरे पटकबाक हिसाब सँ आ मजलिस मे नीक करबाक हिसाब सँ आर बेसी पढ़ी आ जे बुझाय जे ई ओकरा भारी लगतैक सैह मजलिस मे ओकरा उपर प्रक्षेप करी ।

सतरंज (चेस) सेहो खेलायल जाइक । सीनियर वर्सेज जूनियर सेहो होइक । दुइ गोटे खेला रहल अछि, चारि गोटे घेरिकय देखि रहल अछि । आब एतेक आनन्द मे मगन लोक केँ देखि लोक एहने सुखद प्रतिस्पर्धा वला बात सीखत आ कि आवारागर्दी आ गुन्डागर्दी करत ? त नीक गामक नीक संस्कार वाली बात, हमरो गाम नीक मे नाम कएने अछि । चेस हमहूँ सिखलहुँ ।

शहरी बच्चा बड तेज रहय । टार्गेट बनेलहुँ जे एक दिन त हम जरूर जीतब । से भेल । आ जहिया ओकरा जीति लेलहुँ तहिया सँ आर बेसी आत्मविश्वास जागि गेल । फेर त काका-बाबा आ केहेन-केहेन चेस खेलाड़ी केँ देख लेलक गामक छौंड़ा ।

अपना केँ कमजोर कखनहुँ नहि बुझबाक चाही । सिखनाय बड जरूरी छैक । अभ्यास सेहो ओतबे जरूरी छैक । अभ्यास नहि करब आ खाली गप मारब त बेकार कहायब । मेहनत ओतबे करू जतेक सामर्थ्य विकसित भेल अछि । लेकिन जरूरी काज करबे टा करू । बस, भ’ गेल ।
ई बात आइ-काल्हिक बच्चा सब केँ आ शहर दिश भागि रहल मैथिल लोक केँ बुझेबाक लेल लिखल अछि ।

यैह फोटो जीवनक पहिल भेटैछ हमरा जेठ बहिनक एल्बम सँ – आइ एआई सँ कनेक साफ-सफाइ कय केँ साझा करैत ई बालमनक संस्मरण अपन ५४वाँ वर्ष मे लिखल अछि । धन्यवाद पढ़ि देबाक लेल – अपने सब लग सेहो समान संस्मरण हो त दुइ लाइन लिखब, हमहुँ पढ़ब आ आरो लोक पढ़ता ।
हरिः हरः!!

Source: facebook

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