घोङ्हि (थारू कविता)


मुना चौधरी
साकाहारी नै यी चियै मांसाहारी
येकर उपर छै सिसा के खपटा
मुहमे छै पैखना पैखना भितरमे छै गुद्दा
मुह लग्याके सुरकै छै त
आबैछै बहार घोङहिके गुद्दा
ह, येकरे कहैछे घोङहि चोभनाइ या
घोङहि सुरकनाइ ।
खाइले वर चोटगर
वर सबदगर लागैछै
घोङ्हिके तरकारी
बच्चा से लेकर बुरहिया बुरहुवा
सबके लेल छै यी गुणकारी
यी पाइनमे रहैछै
येकर खाना माइट चियै ।
देखैले हैछ वर निक, वर सुन्दर
कन्हिक हरहियर या कन्हिक खैर रङ्के
पोखैर, खता, डबरा या धनखेतामा पाबै छै यी
छोट रहै छै तेकरा कहै छै घोङ्हि
डबल रहैछै तेकरा कहैछै डोका
पसनिसे घोङहिके गाइर काटैछै।
घोङहिके गाइर काइटके माजैछै
तेकर वाद धुव्याके ओकरा निन्है छै ।
लेकिन डोकाके फुट्याके
गुददा निकाइलके निन्हके खाइछै ।
घोङ्हि थारूसबके चियै मौलिक परिकार
रसेरस सैब कोइ खाइले लागल छै घोङ्हि
नै बुझहैछै जाइतभाइत या रङ रूप
सैब कोइके आहार बैनके
सैब कोइमे राखने छै मित्रता कायम
घोङहिके यहया चियै पहिचान ।
मारके झोरमे डुगलछै घोङ्हि
कुटलाहा आलस, बुकनी मेरचाइ
या तोरी, सैरसो लसुन, जिरा, धनिया मसला
लोरहि सिलौठमे पिसके दैछै त गमकैले लागैछै अङना
घोङहिके झोर या
उसना भात निन्हके तैयार छ
अटोहि बटोहि
सैबकोइ थुक घोटै छै
खाइले मन लागैछै सैबके ।
मन हैछै आब खेबै कि ताब ।

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